Edited By Niyati Bhandari,Updated: 06 Mar, 2026 01:18 PM

Kaithoon Vibhishan Temple: राजस्थान के कोटा जिले के ऐतिहासिक कस्बे कैथून में स्थित विभीषण मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं और पौराणिक मान्यताओं के कारण देशभर में प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यह मंदिर करीब 5000 साल पुराना है और दुनिया का इकलौता मंदिर है जहां...
Kaithoon Vibhishan Temple: राजस्थान के कोटा जिले के ऐतिहासिक कस्बे कैथून में स्थित विभीषण मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं और पौराणिक मान्यताओं के कारण देशभर में प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यह मंदिर करीब 5000 साल पुराना है और दुनिया का इकलौता मंदिर है जहां रावण के भाई विभीषण की पूजा की जाती है।
यहां हर साल धुलेंडी के अवसर पर एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है, जिसमें होलिका दहन के अगले दिन हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है। इस परंपरा को देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं।
45वें विभीषण मेले का हुआ भव्य उद्घाटन
इस साल कैथून में आयोजित होने वाले 45वें पारंपरिक विभीषण मेले का उद्घाटन राजस्थान के शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने किया। धुलेंडी के अवसर पर आयोजित इस मेले में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। मेले की शुरुआत आसपास के मंदिरों से निकलने वाली देव विमान शोभायात्रा से हुई।
शोभायात्रा में शामिल सभी देव विमान सबसे पहले विभीषण मंदिर पहुंचे, जहां विधिवत पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद सभी देव विमान मेला स्थल पहुंचे, जहां आतिशबाजी के बीच मुख्य अतिथि मदन दिलावर ने हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया।
होलिका दहन के बाद क्यों जलाया जाता है हिरण्यकश्यप का पुतला?
कैथून में निभाई जाने वाली यह परंपरा पौराणिक कथा से जुड़ी हुई है। मान्यता के अनुसार जब होलिका दहन के दौरान होलिका जलकर भस्म हो गई थी, तब असुर राजा हिरण्यकश्यप क्रोधित हो गया था।
कहा जाता है कि वह अपने पुत्र भक्त प्रह्लाद को मारने के लिए दौड़ा। तभी भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध कर दिया और भक्त प्रह्लाद की रक्षा की।
इसी कथा की याद में कैथून में होलिका दहन के अगले दिन हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है।
दुनिया का इकलौता विभीषण मंदिर
कैथून स्थित यह मंदिर धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि यह दुनिया का एकमात्र मंदिर है जहां लंका के राजा रावण के भाई विभीषण की पूजा की जाती है। इस मंदिर से जुड़ी एक रोचक पौराणिक कथा भी प्रचलित है, जो इसकी स्थापना से जुड़ी हुई है।
कैसे हुआ विभीषण मंदिर का निर्माण?
पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ, तब भगवान शिव ने मृत्युलोक की सैर करने की इच्छा जताई।
इसके बाद विभीषण ने भगवान शिव और हनुमान जी को कांवड़ पर बैठाकर पृथ्वी की यात्रा कराने का निर्णय लिया। हालांकि शिवजी ने एक शर्त रखी थी कि जहां भी कांवड़ जमीन को छूएगा, वहीं यात्रा समाप्त हो जाएगी। यात्रा के दौरान विभीषण का पैर कैथून कस्बे की धरती पर पड़ गया और वहीं यात्रा समाप्त हो गई।
तीन स्थानों पर बने मंदिर
कहते हैं कि कांवड़ का एक सिरा करीब 12 किलोमीटर दूर चौरचौमा में गिरा, जबकि दूसरा सिरा कोटा के रंगबाड़ी क्षेत्र में पड़ा।
इसके बाद:
रंगबाड़ी में हनुमान जी का मंदिर स्थापित किया गया। चौरचौमा में भगवान शिव का मंदिर बनाया गया और जहां विभीषण का पैर पड़ा, वहां विभीषण मंदिर की स्थापना की गई। मंदिर में दिखाई देता है प्रतिमा का केवल ऊपरी हिस्सा। विभीषण मंदिर में स्थापित प्रतिमा भी बेहद अनोखी है। मंदिर में लगी प्रतिमा का केवल धड़ के ऊपर का भाग ही दिखाई देता है, जो श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र है। मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण 1770 से 1821 के बीच महाराव उम्मेद सिंह प्रथम द्वारा करवाया गया था।
मंत्री मदन दिलावर ने क्या कहा?
मेले के उद्घाटन के दौरान मंत्री मदन दिलावर ने विभीषण को परम धर्मात्मा बताते हुए कहा कि उन्होंने अधर्म के मार्ग पर चल रहे अपने भाई रावण का साथ छोड़कर भगवान राम का साथ दिया था।
उन्होंने कहा कि ऐसे मेले हमारी संस्कृति और परंपराओं के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं, जो समाज में आपसी भाईचारा और मेल-जोल बढ़ाने का काम करते हैं।
राजस्थान के कोटा जिले के कैथून में स्थित विभीषण मंदिर न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह भारतीय पौराणिक परंपराओं और संस्कृति का भी अनूठा उदाहरण है। यहां हर साल लगने वाला विभीषण मेला और हिरण्यकश्यप दहन की परंपरा इस स्थान को देशभर में खास पहचान दिलाती है।