Mahatma Gandhi Story : महात्मा गांधी की इस कहानी में छिपी है संवेदनशीलता और सादगी की बड़ी सीख

Edited By Updated: 21 Jun, 2026 11:18 AM

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महात्मा गांधी का जन्मदिन था। रोज की तरह शाम को आश्रम में प्रार्थना के लिए जब वह आए तो देखा कि वहां घी का दीया जल रहा है। "यह घी का दीया किसने जलाया है?"

Mahatma Gandhi Story : महात्मा गांधी का जन्मदिन था। रोज की तरह शाम को आश्रम में प्रार्थना के लिए जब वह आए तो देखा कि वहां घी का दीया जल रहा है। "यह घी का दीया किसने जलाया है?" 

गांधी जी ने वहां बैठे आश्रमवासियों से पूछा। कस्तूरबा बोलीं, "मैंने जलाया है।"

गांधी जी ने उदासी भरे स्वर में कहा, "आज के दिन जो सबसे बुरी बात हुई है वह है इस दीये को जलाना।"

कस्तूरबा मन ही मन सोचने लगीं कि इसमें इतनी बुरी बात क्या हो गई और अन्य आश्रमवासी भी चकित होकर सोचने लगे। गांधी जी उनकी मनोदशा को भांप गए थे। अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, "कस्तूरबा ! तुम जानती हो कि गांव के लोग कितने निर्धन हैं। उन्हें रोटी पर तेल तक चुपड़ने को नहीं मिलता और तुम मेरे जन्मदिन पर घी जला रही हो। इससे बड़ी फिजूलखर्ची क्या हो सकती है?"

कस्तूरबा ने गांधी जी से पूछा, 'आप ही ने तो कुछ दिन पूर्व एक प्रवचन में कहा था कि गलत और बुरी जगह खर्च करना फिजूलखर्ची है। मैंने तो पवित्र भावना से इस घी के दीये को जलाया है।"

गांधी जी ने कस्तूरबा को समझाते हुए कहा, "जो वस्तु निर्धन लोगों को नसीब नहीं होती, उसका उपयोग करने का हमें भी कोई अधिकार नहीं है। इस पर घी जलाना तो और भी गलत है। खासकर तब, जब सूर्य का प्रकाश फैला हो और कहीं अंधेरे का नामोनिशान तक न हो। तब केवल इसलिए घी का दीपक जलाना कि वह तुम्हें अच्छा लगता है, ठीक नहीं है, गलत है और गलत जगह खर्च करना ही फिजूलखर्ची है।'

गांधी जी के समझाने पर कस्तूरबा को अपनी गलती समझ में आ गई। उन्होंने तुरंत गांधीजी से अनजाने में हुई इस गलती के लिए क्षमा मांगी और भविष्य में ऐसी गलती न दोहराने का प्रण लिया।

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