Edited By Sarita Thapa,Updated: 28 May, 2026 01:05 PM

समाज सुधारक मार्टिन लूथर किंग जूनियर के पिता पादरी थे। घर में जरूरत की किसी चीज की कमी नहीं थी। स्कूल जाने का समय आया तो मालूम हुआ कि छह वर्षों तक साथ खेलने वाले गोरे साथी के साथ स्कूल नहीं जा सकते हैं।
Martin Luther Story : समाज सुधारक मार्टिन लूथर किंग जूनियर के पिता पादरी थे। घर में जरूरत की किसी चीज की कमी नहीं थी। स्कूल जाने का समय आया तो मालूम हुआ कि छह वर्षों तक साथ खेलने वाले गोरे साथी के साथ स्कूल नहीं जा सकते हैं। पिता ने उसके साथ में खेलने से भी मना कर दिया था। दोनों बातों का उनके बालमन पर गहरा प्रभाव पड़ा। काले-गोरे का भेदभाव उसकेे दिल में गहरे बैठ गया। अंत तक जवाब ढूंढते रहे कि घृणा करने वालों से प्रेम कैसे किया जाए।
आठवीं में पढ़ते समय उनके स्कूल को एक वाद-विवाद प्रतियोगिता का आमन्त्रण मिला। मार्टिन ने प्रतियोगिता में भाग लेने का निश्चय किया और अपनी टीचर के साथ अटलांटा में डबलिन के लिए चल पड़े। प्रतियोगिता में उन्होंने विषय को इतने प्रभावशाली ढंग से रखा कि उन्हें प्रथम पुरस्कार मिला। मार्टिन खुश थे क्योंकि वह यह मनवाने में सफल हो गए थे कि अमरीकी संविधान में जब तक नीग्रो को समान नागरिक और राजनीतिक अधिकार नहीं मिल जाता है तब तक अमरीका सही मायनों में प्रजातांत्रिक देश नहीं कहा जा सकता है।

डबलिन से लौटते समय बस में मार्टिन को सीट मिली, पर एक गोरे यात्री के सवार होते ही कंडक्टर ने सीट छोड़ने के लिए कहा। सीट न छोड़ने पर कंडक्टर ने गाली दी। फिर भी वह उठने को तैयार नहीं हुए। उनकी टीचर ने कहा कि कानून का पालन करो और जब तक कानून का अधिकार नहीं मिल जाता है तब तक भेदभाव नहीं रोक सकते। टीचर की बात मानकर उन्होंने सीट छोड़ दी। आज्ञा और अवज्ञा का उदाहरण पेश करते हुए नब्बे मील की यात्रा खड़े-खड़े तय की। ब्रैडली नामक इसी टीचर की प्रेरणा से समान नागरिक अधिकारों की लड़ाई लड़ी और वंचितों को न्याय दिलाया।

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