Edited By Niyati Bhandari,Updated: 26 Oct, 2026 11:05 AM

Mirabai Jayanti 2026: जानिए, जोधपुर की राजकुमारी मीराबाई के बचपन की अनोखी घटना, राजकुमार भोजराज से विवाह, जीवन के संघर्ष और वर्ष 1547 में द्वारका में श्रीकृष्ण की मूर्ति में विलीन होने की पौराणिक कथा।
Mirabai Jayanti 2026: प्रत्येक वर्ष शरद पूर्णिमा के दिन मीराबाई जयंती मनाई जाती है। मीराबाई का पूरा जीवन अलौकिक घटनाओं और भक्ति रस से भरा हुआ माना जाता है। उनके लिए संसार के सभी रंग-रूप फीके थे और उनका पूरा जीवन केवल भगवान श्रीकृष्ण के प्रति निष्ठा एवं समर्पण में बीता।
बचपन और दादा राव दूदा का संरक्षण
मीराबाई का जन्म लगभग वर्ष 1498 में हुआ था। वे जोधपुर, राजस्थान के मेड़ता राजकुल की राजकुमारी तथा मेड़ता महाराज के छोटे भाई रतन सिंह की एकमात्र संतान थीं। जब मीराबाई केवल दो वर्ष की थीं, तब उनकी माता का निधन हो गया था। इसके बाद उनके दादा राव दूदा उन्हें मेड़ता ले आए और अपनी देख-रेख में उनका पालन-पोषण किया।
बाल्यकाल की घटना और श्रीकृष्ण को पति स्वीकारना
बाल्यकाल से ही मीराबाई के मन में श्रीकृष्ण की छवि बस गई थी। बचपन में एक दिन उनके पड़ोस में किसी धनवान व्यक्ति के यहां बारात आई थी। स्त्रियों के साथ छत से बारात देखते समय जब मीरा ने अपनी जिज्ञासा में पूछा कि उनका दूल्हा कौन है, तो परिहास में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति की ओर इशारा कर दिया गया। उस बात को मीराबाई ने सत्य मान लिया और बालमन से ही श्रीकृष्ण को अपना सब कुछ और पति स्वीकार कर लिया।

विवाह, वैधव्य और कठिन संघर्ष
विवाह योग्य होने पर परिजनों ने मीराबाई की इच्छा के विरुद्ध उनका विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज के साथ कर दिया। विवाह के कुछ वर्षों बाद ही उनके पति भोजराज का निधन हो गया। पति की मृत्यु के पश्चात उन्हें सती करने का प्रयास किया गया, लेकिन मीराबाई इसके लिए तैयार नहीं हुईं। इसके बाद वे जोगन बनकर साधु-संतों के साथ रहने लगीं तथा पहले वृंदावन और फिर द्वारका में कृष्ण भक्ति में लीन हो गईं।
साधना, प्रताड़ना और रामभक्ति का संगम
मीराबाई मंदिरों में जाकर श्रीकृष्ण की प्रतिमा के सामने घंटों नृत्य करती थीं। उनके ससुराल पक्ष व परिजनों को यह भक्ति मार्ग पसंद नहीं आया, जिस कारण उन्हें विष देकर मारने का प्रयास भी किया गया, परंतु श्रीकृष्ण की कृपा से वे हमेशा सुरक्षित रहीं। कुछ प्रसंगों के अनुसार, गोस्वामी तुलसीदास जी के परामर्श पर उन्होंने कृष्णभक्ति के साथ रामभक्ति के भजन भी रचे। उनका सुप्रसिद्ध भजन "पायो जी मैंने राम रतन धन पायो" आज भी धार्मिक आयोजनों में श्रद्धापूर्वक गाया जाता है।
श्रीकृष्ण की मूर्ति में समा जाना
जीवन भर अनन्य भक्ति करने के फलस्वरूप वर्ष 1547 में द्वारका में श्रीकृष्ण की आराधना करते-करते मीराबाई भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति में ही विलीन हो गईं।
