Smile please: ‘गुरु’ एक रूप अनेक

Edited By Updated: 14 Jan, 2022 11:58 AM

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सदगुरु कबीर जी कहते हैं कि बिना चोट किए घट यानी घड़ा गढ़ा नहीं जा सकता पर सद्गुरु भीतर हाथ लगाकर ही बाहर चोट करता है

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Guru Shishya: सदगुरु कबीर जी कहते हैं कि बिना चोट किए घट यानी घड़ा गढ़ा नहीं जा सकता पर सद्गुरु भीतर हाथ लगाकर ही बाहर चोट करता है ताकि शिष्य का घट सुघट हो जाए। श्री रामचरितमानस में लिखा है कि गुरु के चरण नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान है जिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। इस्लाम धर्म के अनुसार अगर कोई बिना गुरु के चलने की कोशिश करेगा तो वह मार्ग से भटक जाएगा। जैन ग्रंथ ‘पुरुषार्थ सिद्धयुपाय’ के अनुसार गुरु बड़े दयालु हैं। वह श्रावकों और मुमुक्षुओं यानी मोक्ष के अभिलाषियों को मुक्ति के निमित्त उपदेश देते हैं। जो उनके समक्ष अपने को ज्ञानी समझता है, वह बुद्धिहीन है। अंधकार में भटकते हुए, ठोकरें खाते हुए मनुष्य के लिए जितना महत्व दीपक का है, उससे भी बढ़कर महत्व अज्ञान के अंधकार में भटकते हुए जिज्ञासु मानव के लिए है। विनयशील मानव को गुरु ध्येय की पहचान कराता है। गुरु का पद बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। यह पद जितना बड़ा है उतनी ही इस पद की जिम्मेदारी बड़ी है।

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कविवर अजहर हाशमी ने कुछ वर्ष पूर्व एक व्याख्यान में कहा था : ‘‘गुरु है तो ज्ञान है, गुरु है तो ध्यान है, गुरु है तो मान है, गुरु है तो यश है, गुरु है तो र्कीत है, गुरु है तो साहित्य है, गुरु है तो चिंतन है, गुरु है तो संस्कार है, गुरु है तो संस्कृति है, गुरु है तो विकृतियों का विनाश है, गुरु है तो संस्कृति का सृजन है, गुरु है तो प्रेम का प्रकाश फैलता है, तो ध्यान की ज्योति जलती है, गुरु है तो गरिमा का गुलाब खिलता है, गुरु है तो महिमा के मोगरे महकते हैं। जिस तरह हम नदी के जल को लहरों के बिना नहीं जान सकते हैं, जिस प्रकार धु्रव तारे को आकाश के बिना नहीं समझ सकते, उसी प्रकार हम मानवीय जीवन की उन्नति को गुरु के बिना नहीं समझ सकते हैं।

गुरु जीवन का महान कलाकार होता है। जिस तरह टेढ़े-मेढ़े ,खुरदरे पत्थर को लेकर मूर्तिकार अपनी छैनी एवं औजारों से काट-छील कर सुंदर मूर्ति बना देता है, जो भविष्य में पूजनीय बन जाती है, वैसे ही गुरु अपनी काया, वाणी और मन से घड़ कर सुंदर स्वस्थ संस्कृति प्रशिक्षित जीवन का रूप दे देता है इसलिए त्रिलोक काव्य संग्रह में गुरु को शिष्य के जीवन का सुधारक, निर्माणकर्ता एवं परम उपकारी बताया गया है।

गुरु के उत्तरदायित्व का मूल सिद्धांत बताते हुए कहा गया है- गृणाति धर्म शिष्यं प्रतीति गुरु अर्थात जो शिष्य को उसका धर्म बताता है, सिखाता है, वही गुरु है।

वास्तव में गुरु शिष्य का जन्मदाता नहीं परंतु माता-पिता से भी बढ़ कर निर्माणकर्ता है। वह जीवन जीना सिखाता है, यही कारण है कि माता-पिता की अपेक्षा गुरु के प्रति शिष्य विशेष ऋणी होता है। गुरु महिमा के संबंध में धीरज व्यास ने बहुत सुंदर पंक्तियां लिखी हैं : हमारे लिए है सब कुछ गुरु, उन्हीं से हुआ हमारा जीवन शुरू। गुरु हमारे हैं महान, करते हैं वह विद्यादान।

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एक लेखक ने बताया कि गुरु क्या है? गुरु हर सवाल का जवाब है, गुरु हर मुश्किल की युक्ति है, गुरु ज्ञान का भंडार है, गुरु मार्गदर्शक है, गुरु एक अहसास है, गुरु प्यार है, गुरु ज्ञान की वाणी है, गुरु हमारे जीवन का चमत्कार है, गुरु मित्र है, गुरु भगवान रूप है और गुरु अध्यात्म की परिभाषा है।

एक शिष्य ने कहा है :  गुरु जी जब आप शंका दूर करते हो तब आप शंकर लगते हो, जब आप मोह दूर करते हो तो मोहन लगते हो, जब विष दूर करते हो तो विष्णु लगते हो, जब भ्रम दूर करते हो तो ब्रह्मा लगते हो, जब दुर्गति दूर करते हो तो दुर्गा लगते हो, जब गुरूर दूर करते हो तो गुरु जी लगते हो।

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