Edited By Sarita Thapa,Updated: 02 May, 2026 03:01 PM

स्वामी रामदास का नियम था कि वह केवल पांच घरों में भिक्षा मांगने के लिए जाते थे और वहां से जो कुछ मिलता वही लेकर लौट जाते। एक दिन वह ऐसे घर में भिक्षा लेने के लिए पहुंचे, जहां थोड़ी देर पहले ही पति-पत्नी में लड़ाई हुई थी।
Swami Ramdas Story : स्वामी रामदास का नियम था कि वह केवल पांच घरों में भिक्षा मांगने के लिए जाते थे और वहां से जो कुछ मिलता वही लेकर लौट जाते। एक दिन वह ऐसे घर में भिक्षा लेने के लिए पहुंचे, जहां थोड़ी देर पहले ही पति-पत्नी में लड़ाई हुई थी। पत्नी गुस्से में थी। स्वामी जी ने घर के बाहर से आवाज लगाई। उसकी आवाज सुनकर वह महिला बाहर आई और बोली, तुम लोगों को भिक्षा मांगने के सिवाय कोई काम ही नहीं है। जाओ यहां से, मैं कुछ भी नहीं दूंगी। स्वामी जी का यह भी नियम था कि वह भिक्षा में कुछ लिए बगैर नहीं लौटते थे।
स्वामी जी ने उस महिला सेे कहा, ‘मैं भिक्षा में कुछ न कुछ लिए बगैर नहीं जाऊंगा।’ महिला उस वक्त फर्श पर पोंछा लगा रही थी। पोंछा लगाने वाले कपड़े को ही स्वामी जी को देते हुए गुस्से से कहा, “तो फिर यह लो, ले जाओ इसे भिक्षा में ।” स्वामी जी ने प्रसन्न मन से उस कपड़े को लिया और नदी के तट पर पहुंच गए। उन्होंने कपड़े को अच्छी तरह साफ किया, सुखाया और फिर उसकी ‘बाती’ बना कर वह देवालय पहुंचे। स्वामी जी इस भिक्षा को पाकर मन-ही-मन प्रसन्न थे। उधर, वह महिला पश्चाताप कर रही थी कि बेवजह एक सत्पुरुष का अनादर किया। अंत में वह उन्हें ढूंढती हुई देवालय में पहुंच गई।

यह देखकर हैरान रह गई कि स्वामी जी ने उस वस्त्र से बातियां बना ली हैं। वह स्वामी जी के चरणों में गिरकर बोली, “देव, मैंने आपका निरादर किया, क्षमा करें।” रामदास जी बोले, देवी, तुमने उचित ही भिक्षा दी। तुम्हारी भिक्षा का ही परिणाम है कि देवालय रोशनी से जगमगा रहा है और उसका लाभ अनेक लोगों को मिल रहा है। तुम भोजन देती तो सिर्फ मेरे ही काम आता।

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