Edited By Sarita Thapa,Updated: 21 Sep, 2026 06:01 PM

हिंदू धर्म में भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विशेष महत्व है। इसे परिवर्तिनी एकादशी, जलझूलनी एकादशी या पद्मा एकादशी के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं।
Why Lord Vishnu Changes Side : हिंदू धर्म में भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विशेष महत्व है। इसे परिवर्तिनी एकादशी, जलझूलनी एकादशी या पद्मा एकादशी के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद भाद्रपद की इसी एकादशी के दिन श्रीहरि निद्रा के दौरान ही अपनी करवट बदलते हैं। यही वजह है कि इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। तो आइए भगवान विष्णु के करवट बदलने का पौराणिक रहस्य के बारे में-
भगवान विष्णु के करवट बदलने का क्या है पौराणिक रहस्य?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, दैत्यराज बलि बहुत ही दानी और शक्तिशाली राजा थे। उन्होंने अपने तपोबल और पराक्रम से तीनों लोकों पर अपनी अधिकार कर लिया था। स्वर्ग का राज्य छिन जाने के बाद डर के देवराज इंद्र और सभी देवती भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे। देवताओं की रक्षा और राजा बलि के अहंकार को मिटाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतारधारण किया। वामन रूप में भगवान विष्णु राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे और उनसे दान में केवल तीन पग भूमि मांगी। गुरु शुक्राचार्य के मना करने के बावजूद राजा बलि ने तीन पग भूमि दान करने का वचन दे दिया। इसके बाद वामन रूपी श्रीहरि ने अपना विशाल रूप धारण किया।

उन्होंने एक पग में पूरी पृथ्वी और दूसरे में पूरा आकाश नाप लिया। जब तीसरे पग के लिए कोई जगह नहीं बची, तो दानवीर राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। भगवान वामन ने तीसरा पग बलि के सिर पर रखा, जिससे वे पाताल लोक चले गए। राजा बलि की इस भक्ति और वचनबद्धता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनसे वरदान मांगने को कहा। बलि ने प्रार्थना की कि "हे प्रभु! आप सदैव मेरे सामने पाताल लोक में निवास करें।" भगवान विष्णु ने बलि की बात मान ली और पाताल लोक में रहने लगे। लेकिन इससे माता लक्ष्मी और देवता चिंतित हो गए। तब माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षासूत्र बांधकर अपना भाई बनाया और उपहार के रूप में भगवान विष्णु को मांग लिया।भगवान ने बलि को दिए वचन का मान रखते हुए उन्हें वरदान दिया कि वे हर साल देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक पाताल लोक में विश्राम करेंगे। इसी योगनिद्रा के दौरान भाद्रपद शुक्ल एकादशी को वे अपनी करवट बदलते हैं।

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