भारत में क्यों 10 मार्च को मनाया जाता है अंतराष्ट्रीय महिला दिवस?

Edited By Updated: 07 Mar, 2020 10:17 AM

why international women day celebrated on 10 march in india

भारत में लंबे समय से 8 मार्च की जगह 10 मार्च को भारतीय महिला दिवस मनाया जाता है। इसके पीछे की खास वजह ये है कि इस दिन 19वीं सदी में स्त्रियों के अधिकारों, अशिक्षा, छुआछूत, सतीप्रथा, बाल या विधवा-विवाह जैसी कुरीतियों पर आवाज उठाने वाली देश की पहली...

भारत में लंबे समय से 8 मार्च की जगह 10 मार्च को भारतीय महिला दिवस मनाया जाता है। इसके पीछे की खास वजह ये है कि इस दिन 19वीं सदी में स्त्रियों के अधिकारों, अशिक्षा, छुआछूत, सतीप्रथा, बाल या विधवा-विवाह जैसी कुरीतियों पर आवाज उठाने वाली देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले का स्मृति दिवस होता है। इस महिला दिवस पर भारत की इस महानाय‍िका के बारे में जानते हैं ये खास बातें। ये कहना गलत नही होगा कि पूरे भारत में सावित्री बाई फुले जैसी प्रखर चिंतक, स्त्री श‍िक्षा की रीढ़ और क्रांतिकारी सामाजिक विचारक चरित्र है ही नहीं। यही नहीं पूरे विश्व में भी उनके जैसी स्त्री श‍िक्षा अध‍िकारों के लिए प्रतिबद्ध महानायिका मिलना मुशिकल है। इसलिए उनके स्मृत‍ि दिवस को भारतीय महिला दिवस के रूप में मनाते हैं।

सावित्रीबाई फुले का जन्म जनवरी 1831 में महाराष्ट्र के सतारा जिले में नायगांव नामक छोटे से गांव में हुआ था। महज 9 साल की छोटी उम्र में पूणे के रहने वाले ज्योतिबा फुले के साथ उनकी शादी हो गई। विवाह के समय सावित्री बाई फुले पूरी तरह अनपढ़ थीं,पर उनके पति तीसरी कक्षा तक पढ़े थे। वो उस समय पढ़ने का सपना देख रही थीं, जिस वक्त दलितों के साथ बहुत भेदभाव किया जाता था। 
उस वक्त की एक घटना के अनुसार एक दिन सावित्री अंग्रेजी की किसी किताब के पन्ने पलट रही थीं, तभी उनके पिताजी ने देख लिया। वो दौड़कर आए और किताब हाथ से छीनकर घर से बाहर फेंक दी। इसके पीछे ये वजह बताई कि शिक्षा का हक़ केवल उच्च जाति के पुरुषों को ही है, दलित और महिलाओं का शिक्षा ग्रहण करना पाप था। उसी दिन वो किताब वापस लाकर प्रण कर उन्होने कर लिया कि कुछ भी हो जाए वो पढ़ना जरूर सीखेंगी।
यही लगन थी कि उन्होंने खुद पढ़कर अपने पति ज्योतिबा राव फुले के साथ मिलकर लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले। साल 1848 में महाराष्ट्र के पुणे में देश का सबसे पहले बालिका स्कूल की स्थापना की थी। वहीं, 18वां स्कूल भी पुणे में ही खोला गया था। उन्‍होंने 28 जनवरी, 1853 को गर्भवती बलात्‍कार पीड़ितों के लिए बाल हत्‍या प्रतिबंधक गृह की भी स्‍थापना की।

 

मुश्किलों से भरा था रास्ता
सावित्रीबाई फुले जब भी स्कूल जाती थीं, तो लोग उनपर पत्थर मारते थे, गंदगी फेंक देते थे। सावित्रीबाई ने उस दौर में लड़कियों के लिए स्कूल खोला जब बालिकाओं को पढ़ाना-लिखाना सही नहीं माना जाता था। सावित्रीबाई फुले एक कवयित्री भी थीं। उन्हें मराठी की आदिकवयित्री के रूप में भी जाना जाता था।

 

समाजिक बुराईयों के खिलाफ उठाई आवाज
19वीं सदी में सावित्रीबाई ने छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह और विधवा विवाह निषेध जैसी कुरीतियों के विरुद्ध अपने पति के साथ मिलकर काम किया। सावित्रीबाई ने आत्महत्या करने जाती हुई एक विधवा ब्राह्मण महिला काशीबाई की अपने घर में डिलीवरी करवा उसके बच्चे यशंवत को अपने दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया था। यशवंत राव को पाल-पोसकर इन्होंने डॉक्टर बनाया।

 

समाजिक कार्यो में बिताया पूरा जीवन 
सावित्रीबाई फुले के पति ज्‍योतिराव फुले की मृत्यु सन् 1890 में हुई, तब उन्होनें अपने पति के अधूरे कामों को पूरा करने का संकल्प लिया। सावित्रीबाई की मृत्यु 10 मार्च, 1897 को प्लेग के मरीजों की देखभाल करने के दौरान हुई। उनका पूरा जीवन समाज के वंचित तबके खासकर महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष में बीता।

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