Edited By Manisha,Updated: 04 Jun, 2026 10:08 PM

यहां पढ़ें फिल्म बंदर का रिव्यू...
फिल्म- बंदर (Bandar)
स्टारकास्ट- बॉबी देओल (Bobby Deol), सपना पब्बी (Sapna Pabbi), निखिल द्विवेदी (Nikhil Dwivedi)
डायरेक्शन- अनुराग कश्यप (Anurag Kashyap)
रेटिंग- 3.5*
Bandar: हिंदी सिनेमा में कभी-कभी ऐसी फिल्में आती हैं जो सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहतीं बल्कि दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देती हैं। अनुराग कश्यप की फिल्म 'बंदर' भी ऐसी ही एक फिल्म है। यह केवल एक साइकोलॉजिकल ड्रामा नहीं बल्कि पहचान, प्रतिष्ठा, मीडिया ट्रायल और मानवीय भावनाओं की गहरी पड़ताल करती है। फिल्म अपनी गंभीर विषयवस्तु और प्रभावशाली प्रस्तुति के जरिए दर्शकों को शुरू से अंत तक बांधे रखती है।
कहानी
फिल्म की कहानी समर (बॉबी देओल) के इर्द-गिर्द घूमती है जो कभी सफलता और लोकप्रियता के शिखर पर रहा है। उसकी जिंदगी तब अचानक बदल जाती है जब गायत्री (सपना पब्बी) द्वारा लगाए गए आरोप उसकी पूरी दुनिया को हिलाकर रख देते हैं। इसके बाद फिल्म एक ऐसे सफर पर निकलती है जहां समर को केवल समाज ही नहीं बल्कि खुद अपने भीतर के सवालों का भी सामना करना पड़ता है। कहानी प्रतिष्ठा, सच और झूठ के बीच की धुंधली रेखाओं को तलाशती है। डिजिटल युग में मीडिया ट्रायल और सोशल जजमेंट किस तरह किसी व्यक्ति की पूरी पहचान को प्रभावित कर सकते हैं, फिल्म इस विषय को बेहद संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत करती है।

पटकथा की सबसे बड़ी खूबी इसकी भावनात्मक गहराई है। कहानी में कई ऐसे क्षण आते हैं जो दर्शकों को पात्रों के दर्द और संघर्ष से जोड़ देते हैं। हालांकि फिल्म की धीमी गति कुछ जगहों पर दर्शकों के धैर्य की परीक्षा भी लेती है, लेकिन इसकी भावनात्मक पकड़ बनी रहती है।
एक्टिंग
अगर फिल्म की सबसे बड़ी ताकत की बात करें तो वह निस्संदेह बॉबी देओल का अभिनय है। उन्होंने समर के किरदार में ऐसी गंभीरता और संवेदनशीलता दिखाई है जो उनके करियर के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में गिनी जा सकती है। उनके चेहरे के भाव, आंखों की खामोशी और संवादों की प्रस्तुति किरदार के दर्द को प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है। सपना पब्बी ने भी अपने किरदार को मजबूती के साथ निभाया है। उनका प्रदर्शन कहानी में आवश्यक संतुलन बनाए रखता है और दर्शकों को घटनाओं के दूसरे पक्ष को समझने का अवसर देता है। वहीं निखिल द्विवेदी सीमित लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका में प्रभावित करते हैं। सहायक कलाकारों का काम भी फिल्म की यथार्थवादी दुनिया को मजबूत बनाने में सफल रहता है।

डायरेक्शन
निर्देशक अनुराग कश्यप एक बार फिर अपने विशिष्ट अंदाज में कहानी को पर्दे पर उतारते हैं। उनका निर्देशन फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। उन्होंने बिना किसी अनावश्यक नाटकीयता के कहानी को बेहद वास्तविक और प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया है। फिल्म का वातावरण, कैमरा वर्क और साउंड डिजाइन इसकी भावनात्मक ताकत को और बढ़ाते हैं। कई दृश्यों में संवादों से ज्यादा खामोशी प्रभाव छोड़ती है जो कश्यप की परिपक्व निर्देशन शैली को दर्शाती है। हालांकि कुछ हिस्सों में फिल्म की गति थोड़ी धीमी महसूस होती है लेकिन निर्देशक का विजन और कहानी पर उनकी पकड़ इसे संभाले रखती है।