‘दूसरा’ सिर्फ क्रिकेट की कहानी नहीं, बल्कि भावनाओं और बदलाव की भी कहानी है: प्लाबीता बोरठाकुर

Edited By Updated: 29 Oct, 2026 02:38 PM

doosra director and plabita borthakur exclusive interview with punjab kesari

फिल्म के बारे में डायरेक्टर अभिनय देव और अभिनेत्री प्लाबीता बोरठाकुर ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। क्रिकेट और सिनेमा के अनोखे मेल से बनी फिल्म ‘दूसरा’ दर्शकों के सामने एक अलग कहानी पेश करती है। फिल्म में क्रिकेट से जुड़े ऐतिहासिक पलों को एक काल्पनिक कहानी के साथ जोड़ा गया है, जिसमें सौरव गांगुली के लॉर्ड्स में जर्सी लहराने वाले चर्चित पल की झलक भी देखने को मिलती है। फिल्म में प्लाबीता बोरठाकुर मुख्य भूमिका में नजर आ रही हैं। यह फिल्म 23 अक्टूबर को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है। फिल्म के बारे में डायरेक्टर अभिनय देव और अभिनेत्री प्लाबीता बोरठाकुर ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...

अभिनय देव 

सवाल: भारत में क्रिकेट और फिल्मों को लेकर लोगों में जबरदस्त दीवानगी है। आपने अपनी फिल्म ‘दूसरा’ में इन दोनों को एक साथ पेश किया है। इस फिल्म को बनाने का विचार कहां से आया और इसके शीर्षक ‘दूसरा’ का क्या अर्थ है?

अभिनय देव : इस फिल्म की शुरुआत मेरे निर्माता के विचार से हुई थी। वह खुद निर्माता नहीं बनना चाहते थे, लेकिन इस कहानी को लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। इसी सिलसिले में वह मेरे पास आए और उन्होंने 13 जुलाई 2002 को लॉर्ड्स में सौरव गांगुली और भारतीय क्रिकेट टीम से जुड़ी उस ऐतिहासिक घटना के बारे में बताया, जिसने भारतीय क्रिकेट का नजरिया बदलने में अहम भूमिका निभाई। उस दौर में भारतीय टीम के अंदर एक अलग तरह का आत्मविश्वास आया था। टीम मैदान पर इस सोच के साथ उतरती थी कि वह किसी से कम नहीं है। लॉर्ड्स में जीत के बाद सौरव गांगुली का अपनी टी-शर्ट उतारकर जश्न मनाना इसी बदले हुए आत्मविश्वास का प्रतीक बन गया था।

उस घटना को करोड़ों लोगों ने टेलीविजन पर देखा था। खासकर युवाओं पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। उन्हें लगा कि अगर एक भारतीय खिलाड़ी लॉर्ड्स में खड़े होकर इस तरह अपनी जीत का जश्न मना सकता है, तो हम भी अपने क्षेत्र में ऐसा कर सकते हैं। मुझे यह कहानी बहुत पसंद आई और हमने इसे फिल्म के रूप में पेश करने का फैसला किया। हमने तय किया कि सौरव गांगुली और क्रिकेट से जुड़े वास्तविक पलों को ओरिजिनल डॉक्यूमेंट्री फुटेज के जरिए दिखाया जाएगा जबकि तारा की कहानी काल्पनिक होगी जिसे हम सामान्य फिल्म की तरह शूट करेंगे। क्रिकेट और सिनेमा दोनों भारतीयों के लिए बेहद खास हैं और हमारी कहानी इन दोनों के एक साथ आने से ही पूरी होती है। यही इस फिल्म के शीर्षक और इसके विचार के पीछे की भावना है।

सवाल: आपने बताया कि तारा क्रिकेटर नहीं बनना चाहती, बल्कि वह सौरव गांगुली से प्रेरित होती है। उनके जीवन की किस घटना से तारा को प्रेरणा मिलती है?

अभिनय देव : मुझे लगता है कि प्लाबीता का पहले क्रिकेट में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेना इस किरदार के लिए अच्छी बात थी, क्योंकि हमारी फिल्म में तारा भी क्रिकेटर नहीं बनना चाहती। वह सौरव गांगुली के खेल से ज्यादा उनके  व्यक्तित्व और उनके फैसले लेने के तरीके से प्रेरित होती है।

तारा के लिए प्रेरणा का एक अहम पल 1991 में ऑस्ट्रेलिया दौरे से जुड़ा है। उस समय सौरव गांगुली को टीम में खेलने का मौका नहीं मिला था और उनसे 12वें खिलाड़ी की तरह मैदान पर ड्रिंक्स ले जाने के लिए कहा गया था। उन्होंने इस पर अपनी असहमति जताते हुए कहा था कि वह ड्रिंक्स ले जाने के लिए नहीं, बल्कि क्रिकेट खेलने के लिए आए हैं। इस घटना के बाद उन्हें प्रतिबंध का सामना करना पड़ा था। तारा के लिए यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें एक व्यक्ति उस व्यवस्था पर सवाल उठाता है, जिसे वह गलत मानता है। तारा की जिंदगी में भी व्यवस्था पर सवाल उठाने और अपनी बात रखने की अहमियत है। दिलचस्प बात यह है कि वह किसी क्रिकेटिंग उपलब्धि से नहीं, बल्कि सौरव गांगुली के इसी रवैये से प्रेरित होती है। कई बार किसी व्यक्ति का एक छोटा-सा फैसला भी दूसरे इंसान की जिंदगी में बड़ा बदलाव ला सकता है।

सवाल: आपने ‘ब्लैकमेल’, वेब सीरीज ‘24’ और ‘सावी’ जैसी अलग-अलग तरह की कहानियों पर काम किया है। आप खुद को किसी एक जॉनर तक सीमित नहीं रखते। इसकी क्या वजह है?

अभिनय देव : मैं एक क्रिएटिव इंसान के तौर पर किसी एक ढांचे में बंधकर काम करने में विश्वास नहीं रखता। अगर मुझे एक ही तरह की कहानियां बनाने तक सीमित कर दिया जाए, तो मुझे लगेगा कि मैं अपनी रचनात्मकता के साथ न्याय नहीं कर रहा हूं। एक निर्देशक के तौर पर मेरी जिम्मेदारी सिर्फ फिल्म बनाना नहीं, बल्कि अलग-अलग विषयों और कहानियों को अपनी आवाज में दर्शकों के सामने पेश करना भी है।

मुझे नए विषयों पर काम करना और हर बार खुद को एक नई चुनौती देना पसंद है। मैं चाहता हूं कि मेरी अगली फिल्म में ऐसा कुछ हो, जिसे मैंने पहले कभी न किया हो। ‘दूसरा’ मेरे करियर की सबसे चुनौतीपूर्ण फिल्मों में से एक रही है। इसकी कहानी को पर्दे पर उतारने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी। तारा की कहानी काल्पनिक है, जिसे हमने लिखा और शूट किया। वहीं, क्रिकेट से जुड़े वास्तविक पलों के लिए लगभग 3,000 घंटे की फुटेज में से चुनकर करीब 30 मिनट का हिस्सा फिल्म में इस्तेमाल किया गया।

इतनी बड़ी मात्रा में फुटेज को देखना, उसमें से सही पलों को चुनना और उन्हें एक काल्पनिक कहानी के साथ जोड़ना काफी मुश्किल काम था। आमतौर पर दर्शक या तो फिक्शन देखते हैं या डॉक्यूमेंट्री, लेकिन ‘दूसरा’ में दोनों को एक साथ पेश करने की कोशिश की गई है। यही वजह है कि यह फिल्म मेरे लिए तकनीकी और रचनात्मक, दोनों स्तरों पर एक बड़ी चुनौती रही।

सवाल: क्या ‘दूसरा’ पहली भारतीय फिल्म है, जिसमें फिक्शन और डॉक्यूमेंट्री फुटेज को इस तरह मिलाया गया है?

अभिनय देव : मैं यह दावा नहीं करना चाहूंगा कि यह पहली भारतीय फिल्म है, क्योंकि मैंने इस विषय पर इतनी रिसर्च नहीं की है कि निश्चित रूप से ऐसा कह सकूं। संभव है कि पहले भी किसी ने इस तरह का प्रयोग किया हो। हालांकि, इतना जरूर कहूंगा कि इस तरह की फिल्म बनाना एक दुर्लभ और चुनौतीपूर्ण अनुभव है।

हमने वास्तविक क्रिकेट फुटेज और तारा की काल्पनिक कहानी को इस तरह जोड़ने की कोशिश की है कि दोनों एक-दूसरे के पूरक बनें। मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि दर्शक इन दोनों हिस्सों को अलग-अलग न देखें, बल्कि पूरी कहानी के रूप में उनसे जुड़ें। मेरे करियर में यह अब तक के सबसे मुश्किल प्रोजेक्ट्स में से एक रहा है।

सवाल: आपके माता-पिता रमेश देव और सीमा देव अपने समय के दिग्गज कलाकार रहे हैं। क्या आपने बचपन से ही अपने माता-पिता को फिल्मों में काम करते हुए देखा था?

अभिनय देव : बिल्कुल नहीं। मेरे माता-पिता मराठी और हिंदी फिल्मों के साथ-साथ थिएटर के भी जाने-माने कलाकार थे, लेकिन उन्होंने मेरी और मेरे भाई की परवरिश एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार की तरह की। हमारे घर में फिल्मी पार्टियां नहीं होती थीं और न ही फिल्म इंडस्ट्री के लोगों का लगातार आना-जाना रहता था। हम अपने परिवार के साथ त्योहार मनाते थे और घर का माहौल बिल्कुल सामान्य था।

मेरे माता-पिता ने हमारे लिए ऐसा स्कूल चुना, जहां पढ़ाई को ज्यादा महत्व दिया जाता था। उन्होंने हमें जानबूझकर ऐसे माहौल में रखा, जहां हमें सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री का ही अनुभव न मिले, बल्कि जीवन के दूसरे क्षेत्रों को भी समझने का मौका मिले। शायद वे चाहते थे कि हम अपनी पढ़ाई पूरी करें और जीवन में अपने पैरों पर खड़े हों।

बचपन में मुझे यह भी नहीं लगता था कि मेरे माता-पिता इतने बड़े कलाकार हैं। जब हम बाहर जाते थे और लोग उनके आसपास ऑटोग्राफ लेने के लिए इकट्ठा हो जाते थे, तब मुझे एहसास होता था कि वे कितने लोकप्रिय हैं। मेरे माता-पिता ने फिल्मी दुनिया को कभी हमारे घरेलू जीवन पर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने हमें सामान्य जीवन जीने दिया, जिसके लिए मैं उनका आभारी हूं।

सवाल: आपने आर्किटेक्चर की पढ़ाई की और पुणे में बतौर आर्किटेक्ट काम भी किया। फिर फिल्मों में आने का फैसला कैसे लिया? क्या आपके माता-पिता ने इस फैसले में आपका साथ दिया?

अभिनय देव : मेरे माता-पिता ने हमें कभी फिल्म इंडस्ट्री से दूर रहने के लिए मजबूर नहीं किया। उन्होंने सिर्फ इतना समझाया कि फिल्म इंडस्ट्री में काम की कोई गारंटी नहीं होती। कभी लगातार काम मिलता है, तो कभी लंबे समय तक काम नहीं मिलता। इसलिए हमारे पास अच्छी शिक्षा होनी चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर हम किसी दूसरे क्षेत्र में भी अपना करियर बना सकें।

इसी सोच के साथ मैंने आर्किटेक्चर की पढ़ाई की, जबकि मेरे भाई ने कंप्यूटर साइंस चुना। पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने पुणे में करीब एक साल तक आर्किटेक्ट के तौर पर काम किया। लेकिन मेरे मन में फिल्में बनाने और कहानियां सुनाने की इच्छा लगातार बनी हुई थी। मुझे एहसास हुआ कि मैं इस जुनून को छोड़ नहीं सकता।

जब मैंने अपने पिता से इस बारे में बात की, तो उन्होंने कहा कि अगर तुम्हें यही करना है, तो अब पूरी जिम्मेदारी के साथ करो। उन्होंने मुझे याद दिलाया कि शिक्षा को जरूरी मानकर मैंने पढ़ाई तो पूरी कर ली है, इसलिए अब अपने फैसले की जिम्मेदारी भी मुझे ही लेनी होगी। मेरे लिए यह बहुत अच्छी बात थी, क्योंकि उन्होंने मुझे अपने फैसले लेने की आजादी दी।

सवाल: आपके भाई ने अभिनय को चुना, लेकिन आपने हमेशा निर्देशन में दिलचस्पी दिखाई। क्या आपने कभी अभिनेता बनने के बारे में सोचा?

अभिनय देव : नहीं, मैंने कभी अभिनेता बनने के बारे में नहीं सोचा। मैं हमेशा खुद को ऐसी जगह देखता था, जहां मैं अभिनेताओं और तकनीशियनों के साथ मिलकर किसी कहानी को पर्दे पर उतार सकूं। मुझे यह तय करना पसंद था कि किसी कहानी को किस तरह बताया जाए, उसका ट्रीटमेंट कैसा हो और उसे दर्शकों तक किस अंदाज में पहुंचाया जाए।

मेरी दिलचस्पी हमेशा कहानियां सुनाने और उन्हें अपनी सोच के मुताबिक आकार देने में रही है। निर्देशन मुझे इसलिए आकर्षित करता है, क्योंकि इसमें कहानी के अलग-अलग पहलुओं को समझने और पूरी टीम के साथ मिलकर उन्हें एक रूप देने का मौका मिलता है। मुझे लगता है कि हर कहानी को कहने का अपना एक तरीका होता है और उसी तरीके को खोजने में मेरी सबसे ज्यादा दिलचस्पी रहती है।

सवाल: आज के कई युवा करियर और अपने भविष्य को लेकर उलझन में रहते हैं। एक तरफ जुनून होता है, तो दूसरी तरफ पैसा और माता-पिता की उम्मीदें। ऐसे में उन्हें किस आधार पर अपना करियर चुनना चाहिए?

अभिनय देव : मेरा मानना है कि जिंदगी में जुनून सबसे पहले होना चाहिए, क्योंकि वही आपको आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। अगर आप सिर्फ पैसे के पीछे भागेंगे, तो हो सकता है कि आपको वह संतुष्टि न मिले, जिसकी तलाश है। इसके बजाय अगर आप अपने काम में उत्कृष्टता हासिल करने और अपने जुनून को पूरा करने की कोशिश करेंगे, तो पैसा भी धीरे-धीरे आपके पास आ सकता है।

मैं युवाओं से यही कहना चाहूंगा कि वे प्रसिद्धि के पीछे भी न भागें, क्योंकि लोकप्रियता हमेशा एक जैसी नहीं रहती। आज कोई मशहूर है, तो जरूरी नहीं कि कल भी वैसा ही हो। लेकिन अगर आप अपने काम को लेकर ईमानदार हैं और उसे बेहतर बनाने में जुटे रहते हैं, तो वह अनुभव हमेशा आपके साथ रहता है।

आज सोशल मीडिया की वजह से हमारे आसपास बहुत शोर है। हम दूसरों की उपलब्धियां देखते हैं और खुद की तुलना उनसे करने लगते हैं। कभी किसी की कमाई देखकर लगता है कि हम पीछे रह गए हैं, तो कभी किसी की सफलता देखकर अपने फैसलों पर संदेह होने लगता है। सोशल मीडिया अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन उसका शोर इतना नहीं होना चाहिए कि हम अपनी अंदर की आवाज सुनना ही बंद कर दें।

हर व्यक्ति को यह समझने की जरूरत है कि वह क्या करना चाहता है, किस दिशा में आगे बढ़ना चाहता है और किस माध्यम से अपनी बात दुनिया तक पहुंचाना चाहता है। जब आप अपना रास्ता पहचान लेते हैं और पूरी मेहनत से उस पर चलते हैं, तो सफलता मिलने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए दूसरों की जिंदगी देखकर अपने जुनून को मत छोड़िए। अपनी रुचि पहचानिए और उसे पूरी ईमानदारी से आगे बढ़ाइए।

सवाल: ‘दूसरा’ के संगीत के बारे में भी बताइए। क्या फिल्म में गाने हैं? साथ ही, क्या इसे पूरा परिवार देख सकता है?

अभिनय देव : फिल्म में संगीत काफी प्रभावशाली है, लेकिन इसमें गाने नहीं हैं। कहानी की जरूरत को देखते हुए हमने अलग से गाने नहीं बनाए, क्योंकि मुझे लगा कि इससे फिल्म के प्रवाह पर असर पड़ सकता है। यह करीब 77 मिनट की फिल्म है और हमने कोशिश की है कि कहानी अपने उद्देश्य के साथ सीधे दर्शकों तक पहुंचे।

जहां तक फिल्म की रेटिंग की बात है, तो कुछ दृश्यों की वजह से इसे एडल्ट रेटिंग मिल रही है। इसमें कोई परेशानी नहीं है, क्योंकि कहानी का आधार ऐसा है, जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है। हम चाहते हैं कि लोग फिल्म को देखें और उसके विचारों पर चर्चा करें।

सवाल: ‘दूसरा’ के बाद आपके आने वाले प्रोजेक्ट्स क्या हैं? क्या आप किसी नई फिल्म या सीरीज पर काम कर रहे हैं?

अभिनय देव : फिलहाल मेरा अगला प्रोजेक्ट एक सीरीज है, जिसकी शूटिंग अगले दो-तीन महीनों में शुरू होने की उम्मीद है। ‘दूसरा’ का काम पूरा करने के बाद मैं उसकी तैयारी में जुट जाऊंगा। यह एक डार्क कॉमेडी सीरीज होगी, जो मेरे पहले के प्रोजेक्ट्स ‘दिल्ली बेली’ और ‘ब्लैकमेल’ की तरह एक अलग अंदाज में कहानी पेश करेगी। इसके बाद एक फीचर फिल्म पर भी काम करने की योजना है, लेकिन वह अगले साल के आखिर में आगे बढ़ेगी। फिलहाल मेरा ध्यान अपनी अगली सीरीज की तैयारी पर रहेगा।

प्लाबीता बोरठाकुर

सवाल: आपने ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ में भी शानदार अभिनय किया था। आप अपने लिए किस तरह की कहानियां और किरदार चुनती हैं? साथ ही तारा का किरदार आपसे कितना मिलता-जुलता है?

प्लाबीता बोरठाकुर: मैं खुद को बहुत खुशकिस्मत मानती हूं कि मेरे पास ऐसी स्क्रिप्ट्स आती हैं। जब मैंने ‘दूसरा’ के लिए ऑडिशन दिया था, तब कास्टिंग डायरेक्टर रोशनी ने मुझे कुछ सीन भेजे थे। उस समय मुझे यह भी ठीक से नहीं पता था कि फिल्म की पूरी कहानी क्या है। लेकिन जब मैंने स्क्रीनप्ले पढ़ा, तो मुझे लगा कि यह मेरे करियर में पढ़ी गई सबसे बेहतरीन स्क्रिप्ट्स में से एक है।

मेरे लिए किसी फिल्म या शो को चुनने का सबसे बड़ा आधार उसकी कहानी और किरदार होते हैं। अगर मुझे किसी प्रोजेक्ट में दिलचस्पी ही नहीं है, तो फिर अभिनय करने का क्या मतलब है? मैं चाहती हूं कि जिस कहानी का हिस्सा बनूं, उस पर मेरा पूरा विश्वास हो। जब तक मुझे कहानी, स्क्रिप्ट या किरदार में कुछ खास नजर नहीं आता, तब तक मेरे लिए हां कहना मुश्किल होता है।

‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ के बाद ‘दूसरा’ मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक है। हालांकि, अभिमन्यु सर के लिए यह फिल्म तकनीकी रूप से काफी चुनौतीपूर्ण रही, लेकिन मेरे लिए इसका अनुभव सहज था। मेरा काम मुख्य रूप से तारा की काल्पनिक कहानी तक सीमित था। निर्देशक के तौर पर अभिमन्यु सर अपने विजन को लेकर बहुत स्पष्ट थे। पूरी टीम अच्छी तैयारी के साथ आई थी, इसलिए मेरे लिए किरदार को समझना और निभाना आसान हुआ। उन्होंने मुझे तारा को अपने तरीके से निभाने की आजादी भी दी।

जहां तक तारा और मेरी समानता की बात है, तो उसके कुछ भावनात्मक पहलू मुझसे मिलते हैं, लेकिन हमारी जिंदगी बहुत अलग है। मेरी परवरिश बहुत प्यार करने वाले और सहज स्वभाव के माता-पिता के बीच हुई है, जबकि तारा की परिस्थितियां अलग हैं। फिर भी, असुरक्षा, अकेलापन, डर और दूसरों के फैसले का सामना करना जैसी भावनाएं हम सभी ने कभी न कभी महसूस की हैं। इस लिहाज से तारा की यात्रा से जुड़ना मेरे लिए आसान रहा।

सवाल: फिल्म इंडस्ट्री में काम लगातार मिलता रहे, यह जरूरी नहीं है। ऐसे में आप बाहरी शोर, प्रतिस्पर्धा और अनिश्चितता के बीच खुद को कैसे संभालती हैं?

प्लाबीता बोरठाकुर: मेरे लिए भी यह सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। जब मैंने ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ की शूटिंग की थी, तब मैं बहुत खुश थी कि मुझे एक बड़ी फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने का मौका मिला है। मुझे लगा था कि फिल्म की शूटिंग पूरी होने के बाद जल्द ही वह रिलीज हो जाएगी, लेकिन उसे रिलीज होने में करीब तीन साल लग गए। शूटिंग पूरी होने के बाद एक साल तक मेरे पास कोई काम भी नहीं था। ऐसे समय में अनिश्चितता का सामना करना आसान नहीं होता, लेकिन मैंने शुरुआत से ही इस जीवन को चुना था। कॉलेज के बाद मैंने सीधे अभिनय करना शुरू कर दिया था, इसलिए मुझे किसी नियमित नौकरी की तरह लगातार काम मिलने की आदत नहीं थी। मुझे धीरे-धीरे समझ आया कि इस पेशे में कभी बहुत काम होता है और कभी बिल्कुल नहीं।

जहां तक बाहरी शोर की बात है, तो शायद मेरी परवरिश या मेरे स्वभाव की वजह से मैं उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देती। मैं बहुत संतुष्ट रहने वाली इंसान हूं। एक समय ऐसा भी था, जब मेरे पास अगले महीने का किराया देने के लिए पैसे नहीं थे, लेकिन जब तक किराया देने का समय नहीं आता था, मैं अपनी जिंदगी में खुश रहती थी। मैं जीवन को बहुत पसंद करती हूं और अपनी किस्मत पर भी भरोसा करती हूं। मेरा मानना है कि जिंदगी में जो कुछ हो रहा है, उसे हर समय बदलने की कोशिश करने के बजाय कभी-कभी स्वीकार करना भी जरूरी है। मैं परिस्थितियों को अपनाने की कोशिश करती हूं। मैं बहुत ज्यादा कल्पनाओं में खोई रहने वाली इंसान भी हूं, इसलिए शायद आसपास का शोर मुझ तक उतना पहुंचता ही नहीं। इससे मुझे अपने काम और जिंदगी पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है।

सवाल: जब लॉर्ड्स में सौरव गांगुली ने अपनी टी-शर्ट उतारकर जश्न मनाया था, तब आप कितनी बड़ी थीं? क्या आपको वह पल याद है?

प्लाबीता : उस समय मैं काफी छोटी थी और मुझे वास्तव में याद नहीं है कि मैंने वह घटना टेलीविजन पर देखी थी या नहीं। मैं बचपन में क्रिकेट भी ज्यादा नहीं देखती थी। मुझे लगता है कि उस समय मेरे परिवार के बाकी लोग जरूर मैच देख रहे होंगे, लेकिन मैं अपनी ही दुनिया में व्यस्त रहती थी। इसलिए मुझे उस ऐतिहासिक पल को बचपन में देखने की कोई स्पष्ट याद नहीं है।

जब मैंने ‘दूसरा’ के लिए तैयारी शुरू की, तब मैंने पहली बार उस घटना को गंभीरता से देखा। मैंने मैचों की हाइलाइट्स, पुराने मैच और सौरव गांगुली के इंटरव्यू देखे। उसी दौरान मुझे समझ आया कि उस घटना का भारतीय क्रिकेट और लोगों की सोच पर कितना गहरा प्रभाव पड़ा था। फिल्म की तैयारी के दौरान ही मैं इस कहानी और उससे जुड़े ऐतिहासिक पलों को बेहतर तरीके से समझ पाई।

 

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