हमारा मकसद किसी को हीरो या विलेन बनाना नहीं इतिहास को पूरे संदर्भ के साथ दिखाना जरुरी: मनोज सिंह

Edited By Updated: 27 May, 2026 12:35 PM

exclusive interview of movie koun sahi starcast

फिल्म के बारे में स्टारकास्ट ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। गांधी जी को लेकर हिंदी सिनेमा में कई तरह की फिल्में बनी है जिनमें उनके जीवन से लेकर उनसे जुड़े राजनीतिक मुद्दों को भी दिखाया गया है अब एक फिल्म कौन सही आई है जो बाकी फिल्मों से थोड़ी अलग है। यह फिल्म इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं और विचारों को केंद्र में रखती है, खासतौर पर ‘गांधी बनाम गोडसे’ जैसे संवेदनशील विषय पर आधारित है। मनोज सिंह द्वारा निर्देशित और डॉ. पवन टोडी के निर्माण में बनी इस फिल्म का मकसद किसी एक पक्ष को सही या गलत ठहराना नहीं है, बल्कि दर्शकों को दोनों दृष्टिकोणों से अवगत कराना है। फिल्म की खास बात यह है कि यह दर्शकों को सोचने और खुद निर्णय लेने का मौका देती है कि उनके अनुसार कौन सही है। फिल्म 15 मई को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। फिल्म के बारे में स्टारकास्ट ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...

मनोज सिंह

सवाल: इस फिल्म की शुरुआत कैसे हुई? आपको क्यों लगा कि यह कहानी लोगों तक पहुंचनी चाहिए?
हम लोग एक नई फिल्म की प्लानिंग कर रहे थे। तभी पवन जी ने कहा कि क्यों न गांधी जी पर फिल्म बनाई जाए। पहले मुझे लगा कि गांधी जी पर पहले भी बहुत फिल्में बन चुकी हैं, तो हम नया क्या करेंगे?

फिर हमने सोचा कि इतिहास के इस अध्याय को एक अलग तरीके से दिखाया जाए। हमने अपने लेखक अनुज कुमार के साथ बैठकर तय किया कि इसे कोर्टरूम ड्रामा की तरह प्रस्तुत करेंगे, ताकि दोनों पक्ष लोगों के सामने आ सकें गांधी जी का भी और गोडसे जी का भी।

आजकल सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप पर गांधी जी को लेकर तरह-तरह की बातें होती रहती हैं। कोई उन्हें महान मानता है, कोई आलोचना करता है। ऐसे में हमने सोचा कि लोगों को सिर्फ एक पक्ष नहीं, बल्कि पूरा संदर्भ दिखाया जाए, ताकि वे खुद तय करें कि उनके अनुसार कौन सही है।

सवाल: क्या फिल्म का मकसद किसी एक पक्ष को सही साबित करना है?
नहीं, बिल्कुल नहीं। हमारा मकसद किसी को हीरो या विलेन बनाना नहीं है। हमने सिर्फ यह कोशिश की है कि लोग इतिहास को समझें, सोचें और फिर अपनी राय बनाएं। नाथूराम गोडसे भी कभी गांधी जी के समर्थक थे। वे उनकी सभाओं में जाते थे, उनके विचारों से प्रभावित थे। लेकिन समय के साथ उनकी सोच बदली और उन्होंने वह कदम उठा लिया। फिल्म में हमने यही दिखाने की कोशिश की है कि किसी भी इंसान के भीतर भावनाएं और संघर्ष होते हैं।

सवाल: क्या आपको लगा कि फिल्म को लेकर विवाद हो सकता है?
हां, यह एहसास था कि लोग अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दे सकते हैं। लेकिन हमने फिल्म में ऐसा कुछ नहीं दिखाया जो भड़काऊ हो। हमने सिर्फ इतिहास के तथ्यों और विचारों को संतुलित तरीके से रखने की कोशिश की है। आज जरूरत है कि लोग बिना सोचे-समझे किसी को अच्छा या बुरा कहना बंद करें। इतिहास को समझना जरूरी है।

सवाल: आपके अनुसार धर्म और राजनीति का रिश्ता कैसा होना चाहिए?
धर्म का मतलब लोगों को जोड़ना होना चाहिए, तोड़ना नहीं। हर इंसान को अपने धर्म को मानने और उसका पालन करने का पूरा अधिकार है। लेकिन धर्म का इस्तेमाल राजनीति या लोगों के बीच नफरत फैलाने के लिए करना गलत है। धर्म एक ऐसी चीज है जो इंसान को भीतर से बेहतर, शांत और साफ बनाती है।

राजनीति का काम देश और समाज को आगे बढ़ाना होना चाहिए। जो लोग राजनीति में आते हैं, उन्हें जनता के लिए अच्छा काम करना चाहिए, न कि धर्म के नाम पर लोगों को बांटना चाहिए।

डॉ. पवन तोडी

सवाल: महात्मा गांधी का किरदार निभाना कितना चुनौतीपूर्ण था?
यह मेरे लिए सिर्फ एक रोल नहीं था, बल्कि बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी। गांधी जी को लेकर समाज में कई तरह की धारणाएं हैं। मैंने हमेशा यही चाहा कि लोग उनके बारे में सही जानकारी जानें। मैंने उनके जीवन को समझने की कोशिश की उनका रहन-सहन, उनका अनुशासन, उनका व्यवहार। उन्होंने सत्य, अहिंसा और सेवा की जो बातें कहीं, उन्हें महसूस करने की कोशिश की। गांधी जी को सिर्फ महात्मा के रूप में नहीं, बल्कि एक इंसान के रूप में समझना भी जरूरी है।

सवाल: आपको क्या लगता है, दर्शक थिएटर से बाहर किस भावना के साथ निकलेंगे?
दर्शक एक अलग अनुभव लेकर बाहर आएंगे। वे सिर्फ फिल्म नहीं देखेंगे, बल्कि सोचने पर मजबूर होंगे। यह फिल्म लोगों को इतिहास के उस अध्याय को नए नजरिए से देखने का मौका देगी।

अमित रियान

सवाल: अमित, नाथूराम गोडसे का किरदार निभाने के लिए आपने क्या तैयारी की?
ऐसे किरदार निभाना आसान नहीं होता। इसके लिए मैंने काफी पढ़ाई की। मैंने गोडसे जी के भाई गोपाल गोडसे की किताब पढ़ी, फिर तुषार गांधी की किताब भी पढ़ी ताकि दोनों पक्षों को समझ सकूं। सबसे बड़ा चैलेंज था गोडसे के भीतर के इंसान को समझना। आमतौर पर उन्हें सिर्फ गुस्से वाले व्यक्ति के रूप में दिखाया जाता है, लेकिन हमने उनके मानसिक संघर्ष और भावनात्मक पक्ष को भी दिखाने की कोशिश की है। हम किसी को सही या गलत साबित नहीं कर रहे, बल्कि यह दिखा रहे हैं कि हर इंसान की सोच के पीछे कुछ कारण होते हैं।

सवाल: अगर आज गांधी जी का चौथा बंदर होता, जो सोशल मीडिया को दर्शाता, तो वह क्या कहता?
मोबाइल कम देखो।सोशल मीडिया आज की सबसे बड़ी लत बन चुका है।

सवाल: अगर गांधी जी का आज व्हाट्सऐप स्टेटस होता, तो क्या लिखा होता?
अनेकता में एकता

दिलीप सेन

सवाल: इस फिल्म का संगीत बाकी फिल्मों से कितना अलग रहा?
जब मनोज जी ने मुझे कहानी सुनाई तो मैं थोड़ा हैरान भी हुआ और भावुक भी। यह कोई सामान्य फिल्म नहीं है। इसमें इतिहास, भावनाएं और विचारधारा सब कुछ है। सबसे बड़ी चुनौती थी कि संगीत ऐसा हो जो आज की युवा पीढ़ी से जुड़ सके। हमने पारंपरिक भजन शैली के साथ आधुनिक संगीत का मिश्रण किया। फिल्म में रघुपति राघव राजा राम को भी नए अंदाज में प्रस्तुत किया गया है ताकि आज की पीढ़ी उससे जुड़ सके।

सवाल: गांधी जी के सिद्धांत जैसे 'अगर कोई एक थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो' क्या आज भी प्रासंगिक हैं?
हर दौर अलग होता है। पहले का समय अलग था, आज का समय अलग है। लेकिन गांधी जी की बात का असली मतलब था कि प्रतिक्रिया देने से पहले सोचो। अगर किसी ने कुछ किया है, तो पहले यह समझना जरूरी है कि क्यों किया। हर स्थिति में हिंसा समाधान नहीं होती। हमने ये फिल्म मनोरंजन के लिए बनाई है ना कि कौन सही या गलत है ये बताने के लिए ये सोचना आपका काम है।

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