Updated: 11 Jun, 2026 02:15 PM

यहां पढ़ें कैसी है फिल्म मैं वापस आऊंगा...
फिल्म- मैं वापस आऊंगा (Main Vaapas Aaunga)
स्टारकास्ट- दिलजीत दोसांझ (Diljit Dosanjh), नसीरुद्दीन शाह ( Naseeruddin Shah) , शरवरी (Sharvari), वेदांग रैना (Vedang Raina).
डायरेक्टर- इम्तियाज़ अली (Imtiaz Ali)
रेटिंग- 3*
Main Vaapas Aaunga : इम्तियाज अली की फिल्मों से दर्शकों को हमेशा एक खास तरह की भावनात्मक कहानी की उम्मीद रहती है। 'जब वी मेट', 'रॉकस्टार' और 'तमाशा' जैसी फिल्मों के बाद उनकी पहचान ऐसे निर्देशक की बन चुकी है जो प्रेम, यादों और अधूरेपन को खूबसूरती से पर्दे पर उतारते हैं। 'मैं वापस आऊंगा' भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह फिल्म इम्तियाज अली की पुरानी ऊंचाइयों को छू पाती है यह जानने के लिए आपको ये रिव्यू पढ़ना होगा।
कहानी
फिल्म की कहानी भारत विभाजन की पृष्ठभूमि में बुनी गई है। यह सिर्फ दो प्रेमियों की कहानी नहीं, बल्कि बिछड़ने, इंतजार और स्मृतियों की कहानी है। फिल्म दो अलग-अलग समयरेखाओं में चलती है और यह दिखाने की कोशिश करती है कि इतिहास के घाव और अधूरी मोहब्बतें पीढ़ियों तक लोगों का पीछा करती रहती हैं। कहानी का सबसे मजबूत पक्ष इसका भावनात्मक आधार है। इम्तियाज अली रिश्तों के छोटे-छोटे पलों को पकड़ने में माहिर हैं और यहां भी कई दृश्य दिल को छूते हैं। हालांकि, फिल्म का विषय नया नहीं लगता। विभाजन की पृष्ठभूमि पर प्रेम कहानियां पहले भी कई बार दिखाई जा चुकी हैं।

एक्टिंग
अभिनय की बात करें तो नसीरुद्दीन शाह ने अपना सौ प्रतिशत दिया है। काफी देर तक तो आपको समझ ही नहीं आएगा कि वे नसीरुद्दीन है। दिलजीत दोसांझ फिल्म का सबसे मजबूत स्तंभ हैं। वहीं वेदांग रैना और शरवरी की जोड़ी मिश्रित प्रभाव छोड़ती है। कुछ दृश्यों में दोनों स्वाभाविक लगते हैं, लेकिन कई भावनात्मक दृश्यों में उनकी परफॉर्मेंस उतनी प्रभावी नहीं बन पाती जितनी कहानी की मांग है।

डायरेक्शन
तकनीकी रूप से फिल्म मजबूत दिखाई देती है। सिनेमैटोग्राफी विभाजन काल के माहौल को खूबसूरती से रचती है। पंजाब के ग्रामीण परिवेश और बीते समय की यादों को कैमरे ने आकर्षक ढंग से कैद किया है। कई दृश्य देखने में शानदार हैं, लेकिन कभी-कभी यही खूबसूरती कहानी की गति पर भारी पड़ती है। संगीत की जिम्मेदारी ए. आर. रहमान ने संभाली है। कुछ गीत प्रभाव छोड़ते हैं, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि यह एल्बम रहमान के सर्वश्रेष्ठ कामों में गिना जाएगा।
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी लंबाई और गति है। लगभग तीन घंटे की अवधि में कहानी कई बार खिंचती हुई महसूस होती है और आपको बोर करती है। इम्तियाज अली की फिल्मों पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि वे भावनाओं को जरूरत से ज्यादा विस्तार देते हैं, और यहां भी यह समस्या दिखाई देती है। फिल्म के कुछ हिस्सों को और प्रभावी बनाया जा सकता था।