Edited By Tanuja,Updated: 24 Sep, 2026 06:24 PM

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिमालयी जलवायु संकट और हालिया विनाशकारी बाढ़ का मुद्दा उठाएंगे। नेपाल जलवायु न्याय, वित्तीय सहायता और पुनर्निर्माण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग चाहता है। प्रारंभिक आकलन में आपदा प्रभावित...
New York: हिमालय में बदलता मौसम अब सिर्फ नेपाल की समस्या नहीं रह गया है। ग्लेशियरों के पिघलने, बर्फ और चट्टानों के खिसकने तथा अचानक आने वाली विनाशकारी बाढ़ ने पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। अब नेपाल इस संकट की आवाज संयुक्त राष्ट्र तक पहुंचाने जा रहा है। प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह संयुक्त राष्ट्र महासभा में जलवायु न्याय, आर्थिक सहायता और हिमालयी आपदाओं से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग की मांग रखेंगे। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह शुक्रवार सुबह भारतीय समयानुसार संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र को संबोधित करेंगे। यह प्रधानमंत्री बनने के करीब छह महीने बाद उनकी पहली विदेश यात्रा है।
रिपोर्टों के अनुसार शाह अपने भाषण में यह मुद्दा उठा सकते हैं कि नेपाल जैसे कम कार्बन उत्सर्जन वाले देशों को जलवायु परिवर्तन की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। नेपाल का तर्क है कि जिन देशों का वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान बेहद कम है, उन्हें जलवायु परिवर्तन से होने वाली तबाही के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहायता और जलवायु न्याय मिलना चाहिए। नेपाल इस अभियान को 26 अगस्त को भोटेकोशी नदी क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ से जोड़कर आगे बढ़ा रहा है। नेपाल के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र में बर्फ-चट्टान के ढहने और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं के बाद भयंकर बाढ़ आई, जिसने बड़े पैमाने पर जान-माल को नुकसान पहुंचाया। रिपोर्ट के मुताबिक इस आपदा में 1,400 से ज्यादा लोगों की मौत और 5,000 से अधिक लोगों के लापता होने की बात सामने आई है।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने 2023 में नेपाल यात्रा के दौरान हिमालय में तेजी से पिघलते ग्लेशियरों को लेकर गंभीर चिंता जताई थी। उन्होंने उस समय कहा था कि दुनिया की ‘छत’ तेजी से ढह रही है। बाद में भी गुतारेस ने हिमालय में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के तेजी से और अपेक्षा से अधिक तीव्र होने की बात कही। ग्लेशियरों के पीछे हटने से हिमनद झीलों का आकार बढ़ सकता है, स्थायी रूप से जमी जमीन के पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है और मौसम का मिजाज अधिक अनिश्चित हो सकता है। इसका असर बाढ़, भूस्खलन और पानी की उपलब्धता पर पड़ सकता है।
2024 में भी तबाही मचा चुकी है बारिश
नेपाल में सितंबर 2024 में भी अत्यधिक बारिश ने बड़े पैमाने पर बाढ़ और भूस्खलन की स्थिति पैदा की थी। इस दौरान 200 से अधिक लोगों की मौत हुई और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा। नेपाल के जल विज्ञान एवं मौसम विज्ञान विभाग ने कई जिलों में रिकॉर्ड बारिश दर्ज की थी। बागमती, नारायणी और कोशी नदी घाटियों में नदियों का जलस्तर ऐतिहासिक बाढ़ स्तर से भी ऊपर चला गया था। विशेषज्ञों के अनुसार किसी बड़ी बाढ़ के प्रभाव को केवल अत्यधिक बारिश से नहीं समझा जा सकता।
तेजी से हो रहा शहरीकरण, कमजोर जल निकासी व्यवस्था, बाढ़ वाले इलाकों में अतिक्रमण, बिना पर्याप्त योजना के निर्माण और संवेदनशील जलग्रहण क्षेत्रों में वनों की कटाई भी नुकसान बढ़ा सकती है। 2024 की बाढ़ के अध्ययन में भी अनियोजित निर्माण और कमजोर बुनियादी ढांचे को नुकसान बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में गिना गया था। नेपाल की अर्थव्यवस्था में जलविद्युत, कृषि, पर्यटन और जल संसाधन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन बदलती जलवायु इन सभी क्षेत्रों के लिए नए खतरे पैदा कर रही है।