Edited By Tanuja,Updated: 05 Apr, 2026 02:19 PM

Pakistan मिडिल ईस्ट युद्ध में फंसता दिख रहा है। Saudi Arabia के साथ रक्षा समझौता और आर्थिक निर्भरता उसे दबाव में ला रहे हैं, जबकि Iran से टकराव का खतरा बढ़ रहा है। तटस्थ रहना अब मुश्किल होता जा रहा है।
Islamabad: मिडिल ईस्ट में तेजी से बढ़ते युद्ध ने Pakistan की स्थिति को बेहद कठिन बना दिया है। अब तक पाकिस्तान ने Saudi Arabia और Iran के बीच संतुलन बनाकर रखा था, लेकिन अब यह संतुलन टूटता नजर आ रहा है और उसे किसी एक पक्ष की ओर झुकना पड़ सकता है। पाकिस्तान की मुश्किलें 2025 में हुए सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते के बाद और बढ़ गई हैं। इस समझौते के तहत अगर सऊदी अरब पर हमला होता है, तो पाकिस्तान को उसकी सुरक्षा में साथ देना होगा। पहले पाकिस्तान केवल ट्रेनिंग, सलाह और सीमित सैन्य सहयोग देता था, लेकिन अब उस पर सीधे सैन्य भागीदारी का दबाव बन सकता है।
आर्थिक रूप से भी पाकिस्तान काफी हद तक सऊदी अरब पर निर्भर है। सऊदी अरब ने पाकिस्तान को अरबों डॉलर की आर्थिक मदद, निवेश और कर्ज दिया है। इसके अलावा International Monetary Fund (IMF) के प्रोग्राम में भी सऊदी समर्थन अहम भूमिका निभाता है। ऐसे में अगर पाकिस्तान सऊदी की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, तो उसकी आर्थिक स्थिति और बिगड़ सकती है। दूसरी तरफ, अगर पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ खुलकर खड़ा होता है, तो उसे Iran के साथ सीधे टकराव का खतरा उठाना पड़ेगा। ईरान पाकिस्तान का पड़ोसी देश है और दोनों के बीच सीमाएं जुड़ी हुई हैं। ऐसे में किसी भी सैन्य या राजनीतिक तनाव का असर तुरंत सुरक्षा और स्थिरता पर पड़ सकता है। स्थिति को और गंभीर बनाता है यह तथ्य कि पाकिस्तान पहले से ही कई मोर्चों पर दबाव में है।
अफगानिस्तान सीमा पर अस्थिरता बनी हुई है, भारत के साथ रिश्ते संवेदनशील हैं, और देश की आर्थिक हालत कमजोर है। ऐसे में अगर ईरान के साथ एक नया मोर्चा खुलता है, तो यह पाकिस्तान के लिए बहुत भारी साबित हो सकता है। इसके अलावा, सऊदी अरब में पहले से तैनात पाकिस्तानी सैनिक भी जोखिम बढ़ा रहे हैं। शांति के समय में यह सहयोग सामान्य था, लेकिन युद्ध के हालात में यही सैनिक सीधे संघर्ष में शामिल हो सकते हैं। इससे पाकिस्तान धीरे-धीरे बिना बड़े ऐलान के ही युद्ध का हिस्सा बन सकता है। कुल मिलाकर, पाकिस्तान इस समय एक बेहद नाजुक स्थिति में है। एक तरफ सऊदी अरब का आर्थिक और सैन्य दबाव है, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ टकराव का खतरा। ऐसे में उसकी “न्यूट्रल” नीति कमजोर पड़ती जा रही है और आने वाले समय में उसे कोई बड़ा और कठिन फैसला लेना पड़ सकता है।