Edited By Mansa Devi,Updated: 03 Apr, 2026 04:55 PM

पाकिस्तान में वर्ष 2026 की पहली तिमाही में हिंसा में कुल मिलाकर कमी के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन इसके विपरीत बलूचिस्तान में सुरक्षा स्थिति तेजी से खराब होती नजर आ रही है।
इंटरनेशनल डेस्क: पाकिस्तान में वर्ष 2026 की पहली तिमाही में हिंसा में कुल मिलाकर कमी के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन इसके विपरीत बलूचिस्तान में सुरक्षा स्थिति तेजी से खराब होती नजर आ रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रांत में हिंसक घटनाओं में 104 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे सरकार के आतंकवाद-रोधी दावों पर सवाल उठने लगे हैं।
मौतों का आंकड़ा दोगुना, सबसे घातक तिमाही
रिपोर्ट के मुताबिक, बलूचिस्तान में मरने वालों की संख्या 217 से बढ़कर 443 हो गई है। यह पिछले एक दशक से अधिक समय की सबसे घातक तिमाही मानी जा रही है। देशभर में हिंसा से हुई कुल मौतों में से 55 प्रतिशत मौतें केवल इसी प्रांत में हुईं, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है।
खैबर पख्तूनख्वा में कमी, बलूचिस्तान बना हिंसा का केंद्र
जहां खैबर पख्तूनख्वा में हिंसा और हताहतों की संख्या में कुछ कमी देखी गई, वहीं बलूचिस्तान में हालात बिल्कुल उलट रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अंतर पाकिस्तान की सुरक्षा नीतियों के असमान प्रभाव को उजागर करता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में हालात सुधरते हैं तो कुछ में और बिगड़ जाते हैं।
उग्रवादियों की बदलती रणनीति चिंता का कारण
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि उग्रवादी समूह अब अधिक आधुनिक हथियारों, इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED) और ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे उनके हमले अधिक संगठित और घातक हो गए हैं, जिससे हिंसा का दायरा और प्रभाव दोनों बढ़ा है।
सक्रिय संगठनों की बढ़ती गतिविधियां
हिंसा में इस बढ़ोतरी को तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और बलूच अलगाववादी संगठनों की सक्रियता से जोड़ा जा रहा है। हाल के समय में जाफर एक्सप्रेस के अपहरण और बलूच लिबरेशन आर्मी के ऑपरेशन जैसे घटनाक्रम इन समूहों की बढ़ती ताकत और रणनीतिक क्षमता को दर्शाते हैं।
सुरक्षा बलों और उग्रवादियों के बीच लगातार झड़पें
प्रांत में सुरक्षा बलों और सशस्त्र समूहों के बीच लगातार मुठभेड़ हो रही हैं। उग्रवादी समूह सैन्य ठिकानों और अहम बुनियादी ढांचे को निशाना बना रहे हैं, जिससे जान-माल का नुकसान लगातार बढ़ रहा है।
सरकारी दावों पर उठ रहे सवाल
हालांकि सरकार देशभर में हिंसा में कमी का दावा कर रही है, लेकिन बलूचिस्तान में तेजी से बिगड़ती स्थिति इन दावों को चुनौती देती नजर आ रही है। रिपोर्ट के अनुसार, अगर हालात पर जल्द काबू नहीं पाया गया तो यह संकट और गहरा सकता है।