Edited By Anu Malhotra,Updated: 03 Sep, 2026 08:05 AM
Maternity Leave से लौटने के बाद वर्किंग वूमन के अधिकार घटाने और उन्हें साइडलाइन करने वाली कंपनियों के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में साफ कर दिया है कि प्रेग्नेंसी या मैटरनिटी लीव के कारण किसी भी महिला...
नई दिल्ली: Maternity Leave से लौटने के बाद वर्किंग वूमन के अधिकार घटाने और उन्हें साइडलाइन करने वाली कंपनियों के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में साफ कर दिया है कि प्रेग्नेंसी या मैटरनिटी लीव के कारण किसी भी महिला कर्मचारी को करियर में नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता। दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि प्रेग्नेंसी या मैटरनिटी की वजह से किसी महिला को प्रोफेशनल या करियर से जुड़ा नुकसान नहीं होना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि आम तौर पर, महिला को उसी पोस्ट और ज़िम्मेदारियों पर लौटना चाहिए जो मैटरनिटी लीव पर जाने से पहले उसके पास थीं। अगर किसी ठोस वजह से ऐसा मुमकिन नहीं है, तो उसे वैसी ही सैलरी, स्टेटस, सीनियरिटी, जिम्मेदारियों और करियर के मौकों वाली बराबर की पोस्ट दी जानी चाहिए।
31 अगस्त, 2026 को जस्टिस सचिन दत्ता की पीठ ने मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, 1961 के तहत सुनवाई करते हुए एक कंपनी को पीड़ित महिला कर्मचारी को 10 लाख रुपये का मुआवजा और 1.5 लाख रुपये कानूनी खर्च देने का आदेश दिया है। 8 हफ़्ते में यह रकम न चुकाने पर 9% सालाना ब्याज भी देना होगा, मैटरनिटी लीव से लौटने के बाद कथित तौर पर प्रोफेशनल नुकसान उठाना पड़ा था।
14 साल का अनुभव, 2022 में बनीं मैनेजर
याचिकाकर्ता एक चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, जिन्हें लगभग 14 साल का प्रोफेशनल अनुभव है। उन्हें 2022 में एक कंपनी में मैनेजर-अकाउंटिंग के तौर पर नियुक्त किया गया था, जिसकी मासिक सैलरी लगभग 2.6 लाख रुपये थी। मई 2023 में, उन्होंने कंपनी को अपनी प्रेग्नेंसी के बारे में बताया। इसके बाद उन्हें दूसरी टीम में भेज दिया गया। वह दिसंबर 2023 में मैटरनिटी लीव पर गईं और जुलाई 2024 में काम पर लौटीं।
महिला ने आरोप लगाया कि मैटरनिटी लीव से लौटने के बाद उन्हें उनकी पुरानी पोस्ट और ज़िम्मेदारियां वापस नहीं दी गईं। इसके बजाय, उन्हें ट्रेज़री डिपार्टमेंट में भेज दिया गया। उनके अनुसार, नई भूमिका में उनके अंडर कोई कर्मचारी काम नहीं कर रहा था। उन्हें लंबे समय तक मैनेजरों की मीटिंग से भी दूर रखा गया। उन्होंने आरोप लगाया कि पुरुष सहयोगियों को सीनियर मैनेजर के पदों पर प्रमोट किया गया, जबकि उन्हें उनकी पुरानी प्रोफेशनल पोस्ट पर वापस नहीं लाया गया। उन्होंने यह भी शिकायत की कि कंपनी में क्रेच (बच्चों की देखभाल की सुविधा) की सुविधा नहीं थी। आखिरकार उन्होंने अक्टूबर 2024 में इस्तीफ़ा दे दिया और दूसरी कंपनी जॉइन कर ली।
कंपनी ने आरोपों को खारिज किया
कंपनी ने महिला के आरोपों को खारिज कर दिया। उसने कहा कि उनकी पोस्ट, लेवल और सैलरी में कोई बदलाव नहीं हुआ और वह मैनेजर-अकाउंटिंग के तौर पर उसी लेवल पर बनी रहीं। कंपनी ने यह भी कहा कि ट्रेज़री डिपार्टमेंट में उनका ट्रांसफर कुछ समय के लिए था और यह ऑर्गनाइज़ेशन में बदलाव और बिज़नेस की ज़रूरतों की वजह से किया गया था। कंपनी ने यह भी दावा किया कि उन्हें सैलरी में बढ़ोतरी और मैटरनिटी से जुड़े सभी कानूनी फ़ायदे मिले।
मैटरनिटी बेनिफ़िट का मतलब सिर्फ़ छुट्टी नहीं: हाई कोर्ट
हाई कोर्ट ने कहा कि मैटरनिटी बेनिफ़िट एक्ट, 1961 की धारा 12 के तहत मिलने वाली सुरक्षा सिर्फ़ मैटरनिटी लीव के दौरान महिला को नौकरी से निकाले जाने से बचाने तक सीमित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि मैटरनिटी लीव से लौटने वाली महिला को आम तौर पर उसी पद पर वापस बहाल किया जाना चाहिए जिस पर वह छुट्टी लेने से पहले काम कर रही थी। अगर किसी ठोस वजह से ऐसा करना मुमकिन नहीं है, तो उसे बराबर का पद दिया जाना चाहिए जिसमें सैलरी और स्टेटस, सीनियरिटी, ज़िम्मेदारियां, मैनेजर के तौर पर अधिकार, फ़ैसले लेने की शक्ति, प्रमोशन के मौके और करियर की संभावनाएं काफ़ी हद तक वैसी ही हों।
हाई कोर्ट ने एम्प्लॉयर के लिए भी एक अहम निर्देश जारी किया। अगर मैटरनिटी लीव (प्रसूति अवकाश) के दौरान किसी कर्मचारी की ज़िम्मेदारियों, सैलरी, ग्रेड, रिपोर्टिंग स्ट्रक्चर, टीम या वर्कप्लेस में कोई बड़ा बदलाव किया जा रहा है, तो कर्मचारी को इसकी जानकारी पहले ही दे दी जानी चाहिए।