Dry Eye Disease: तेजी से बढ़ रही 'ड्राई आई' की समस्या, मां के दूध में मौजूद प्रोटीन से होगी दूर

Edited By Updated: 07 Apr, 2026 01:44 PM

dry eye disease the problem of dry eye is increasing rapidly

नेशनल डेस्क: आज के समय में मोबाइल, लैपटॉप और टीवी स्क्रीन का इस्तेमाल बहुत बढ़ गया है। जिसकी वजह से आंखों से जुड़ी समस्याओं को तेजी से बढ़ रही है। खासकर ड्राई आई डिजीज...

नेशनल डेस्क: आज के समय में मोबाइल, लैपटॉप और टीवी स्क्रीन का इस्तेमाल बहुत बढ़ गया है। जिसकी वजह से आंखों से जुड़ी समस्याओं को तेजी से बढ़ रही है। खासकर ड्राई आई डिजीज (सूखी आंखों की समस्या) अब सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही, बल्कि बच्चे और युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। आंखों में जलन, खुजली, चुभन, थकान और धुंधलापन जैसे लक्षण अब आम हो गए हैं। अब तक इसके इलाज के लिए आई ड्रॉप और आर्टिफिशियल टियर्स का इस्तेमाल होता रहा है, जो केवल थोड़ी देर के लिए राहत देते हैं।

एम्स ने जगाई नई उम्मीद 
इसी बीच, एम्स (नई दिल्ली) के आरपी सेंटर फॉर ऑप्थेल्मिक साइंसेज में हुए एक नए क्लीनिकल ट्रायल ने उम्मीद जगाई है। इस ट्रायल में मां के दूध में पाए जाने वाले एक प्रोटीन ‘लैक्टोफेरिन’ से बनी दवा के अच्छे नतीजे सामने आए हैं। डॉक्टरों का मानना है कि यह दवा भविष्य में ड्राई आई के इलाज में काफी असरदार साबित हो सकती है।

ट्रायल का क्या हुआ नतीजा? 
इस शोध का नेतृत्व डॉ. नम्रता शर्मा और डॉ. सुजाता शर्मा ने किया। इसमें करीब 200 मरीजों को शामिल किया गया। मरीजों को तीन महीने तक दिन में दो बार 250 मिलीग्राम लैक्टोफेरिन की गोली दी गई और फिर छह महीने तक उनकी निगरानी की गई। नतीजों में पाया गया कि मरीजों की आंखों की नमी बढ़ी, आंसुओं की मात्रा और गुणवत्ता में सुधार हुआ और सूखापन कम हुआ। साथ ही जलन, खुजली और धुंधलापन जैसे लक्षणों में भी राहत मिली।

क्या है लैक्टोफेरिन? 
लैक्टोफेरिन एक प्राकृतिक प्रोटीन है, जो मां के दूध में पाया जाता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है। यह सिर्फ लक्षणों को दबाने के बजाय बीमारी की जड़, जैसे सूजन और आंसू बनने की कमी पर काम करता है।

लोगों तक पहुंचने में लगेगा कितना समय? 
शोधकर्ताओं के अनुसार यह दवा जापान में तैयार की गई है और भारत में इसका परीक्षण किया गया है। हालांकि यह अभी ट्रायल के चरण में है, इसलिए इसे आम लोगों तक पहुंचने में अभी एक से डेढ़ साल का समय लग सकता है, क्योंकि इसके लिए जरूरी सरकारी मंजूरी भी लेनी होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि 2030 तक शहरी भारत की लगभग 45 प्रतिशत आबादी ड्राई आई की समस्या से प्रभावित हो सकती है। खासकर 21 से 40 साल के लोगों में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है।

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