Edited By Parveen Kumar,Updated: 21 Jun, 2026 06:05 PM
इसके तीन कारण हैं। मैं पहली पीढ़ी का एंटरप्रेन्योर हूँ और मेरा सफर उदारीकरण के साथ शुरू हुआ। मेरा ग्रेजुएशन उस साल पूरा हुआ जब आर्थिक सुधारों ने लाइसेंस राज को खत्म करना शुरू किया, जबकि देशबंधु गुप्ता ने एक ऐसे दौर में लुपिन की नींव रखी, जब आर्थिक...
‘‘मेड इन इंडिया’’के माध्यम से आपने न केवल देश बंधु गुप्ता के सफर को, बल्कि भारतीय फार्मा उद्योग के विकास को भी दर्शाया है। आपको यह कहानी सुनाने की प्रेरणा कैसे मिली?
इसके तीन कारण हैं। मैं पहली पीढ़ी का एंटरप्रेन्योर हूँ और मेरा सफर उदारीकरण के साथ शुरू हुआ। मेरा ग्रेजुएशन उस साल पूरा हुआ जब आर्थिक सुधारों ने लाइसेंस राज को खत्म करना शुरू किया, जबकि देशबंधु गुप्ता ने एक ऐसे दौर में लुपिन की नींव रखी, जब आर्थिक सोच एंटरप्रेन्योरशिप को प्रोत्साहित करने के बजाय उसे सीमित करती थी।
दूसरा, आज दुनिया ‘मैन्युफैक्चरिंग हब’ के रूप में चीन की स्वीकार्यता को लगभग मान चुकी है, लेकिन वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी मैन्युफैक्चरिंग भारत के लिए लाखों लोगों को खेती से बाहर निकालकर बेहतर रोजगार देने की क्षमता रखती है।भारतीय फार्मा आज दुनिया की लगभग 60 प्रतिशत दवाइयाँ बनाता है- यह एक असाधारण लेकिन कम सराहा गया मैन्युफैक्चरिंग सफलता का उदाहरण है।
तीसरा, इस किताब ने मुझे तीन साहसी यात्राओं की कहानी बताने का अवसर दि- भारतीय फार्मा उद्योग का उदय, लुपिन का निर्माण, और एक ऐसे एंटरप्रेन्योर का जीवन, जो शायद आज भी शिक्षक होते अगर उन्हें बिट्स पिलानी में केमिस्ट्री प्रोफेसर की नौकरी से नहीं निकाला गया होता।इस किताब ने मुझे यह एहसास कराया कि बहादुरी सबसे महत्वपूर्ण गुण है- क्योंकि इसे दिखावा करके हासिल नहीं किया जा सकता।
इस किताब में बताया गया है कि भारत, जो कभी आयातित दवाओं पर निर्भर था, वह ‘‘पूरी दुनिया की फार्मेसी’’ बन गया। आपके मुताबिक इस सफर के सबसे बड़े मोड़ कौन से थे?
इस सफर के दो निर्णायक मोड़ थे- नीति में बदलाव और उस पर उद्यमियों की प्रतिक्रिया। दुनिया के दो अलग-अलग हिस्सों में दो सरकारों ने दवाइयों को अधिक किफायती बनाने के लिए कानून बनाए- भारत का पेटेंट अधिनियम, 1970 और अमेरिका का हैच-वैक्समैन अधिनियम, 1984।
दो अलग इरादों से बनाए गए इन कानूनों ने मिलकर एक बड़ा अवसर पैदा किया, जिसे उद्यमियों ने समय रहतेपहचानाऔर उसका लाभ उठाया। यह इसलिए और भी उल्लेखनीय है क्योंकि वे एक ऐसे सिस्टम में काम कर रहे थे जहाँ कुछ भी बनाना आसान नहीं था- न पूंजी थी, न इकोसिस्टम, और नियम-कानून भी अत्यधिक थे।फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार आगे बढ़ते रहे
देश बंधुगुप्ता का सफर मजबूती, एंटरप्रेन्योरशिप और राष्ट्र-निर्माण का सफर है। आज के युवा एंटरप्रेन्योरऔर बिज़नेस लीडर्स को उनके जीवन से क्या सीख लेनी चाहिए?
डीबीजी के जीवन से सबसे बड़ी सीख यह है कि हमें अपने लंबे और अनिश्चित जीवन में खुद से एक बुनियादी सवाल बार‑बार पूछना चाहिए- जोनास साल्क के शब्दों में, “क्या आप एक अच्छे पूर्वज हैं?” डीबीजी एक अच्छे पूर्वज थे, क्योंकि उनके पास तीन विशिष्ट क्षमताएँ थीं।
पहला, वह समझते थे कि संस्थान हमेशा व्यक्तियों से बड़े और अधिक टिकाऊ होते हैं।वह अक्सर कहते थे-अगर जल्दी जाना है तो अकेले चलो, लेकिनअगर दूर तक जाना है तो साथ मिलकर चलो।
दूसरा, उन्होंने गहराई से समझा था किमहान परिणाम सोच और क्रियान्वयन के संतुलन से ही आते हैं।बहुत ज्यादा सोचना और कम करना-इसका मतलब है कुछ नहीं होगा। और बिना सोचे सिर्फ करते रहना-इससे कुछ बड़ा बनता नहीं है।
तीसरा, उन्होंने अल्पकाल और दीर्घकाल- दोनों को साथ लेकर चलने की दुर्लभ क्षमता दिखाई।उन्होंने अपनी कंपनी और देश के लिएअगली तिमाही और अगले 25 वर्षों- दोनों पर समान ध्यान दिया।
महान संस्थाएँ रातोंरात नहीं बनतीं।डीबीजी ने दशकों की मेहनत से लुपिन को खड़ा किया। उनके जीवन में कईबाधाएंआईं- 1993 से 2003 का दशक वित्तीय संकटों के कारण बेहद चुनौतीपूर्ण रहा, जब कंपनी लगभग दिवालिया होने की स्थिति में पहुँच गई थी।
लेकिन यही उनकी असली ताकत थी- उन्होंने अल्पकालीन कठिनाइयों के बावजूद दीर्घकाल के लिए निवेश जारी रखा, चाहे वह वैश्विक विस्तार हो, रिसर्च हो या भविष्य की रणनीति।आखिरकार, यही लगातार निवेश भविष्य की सफलता का आधार बना।
देश बंधु गुप्ता राजस्थान से हैं। यह राज्य एंटरप्रेन्योरशिप की मजबूत भावना के लिए मशहूर है। राजस्थान में उनके पालन-पोषण का उन की लीडरशिप और विज़न पर क्या असर पड़ा, जिसने लुपिन को एक ग्लोबल फार्मास्युटिकल कंपनी बना दिया?
मेरा मानना है कि डीबीजी के पालन‑पोषण ने उनकी सोच और नेतृत्व पर गहरा प्रभाव डाला। वह राजस्थान के एक शिक्षक परिवार से आए थे, जहाँ स्थिरता को महत्व दिया जाता था और जोखिम को सावधानी से देखा जाता था। ऐसे माहौल में एंटरप्रेन्योर बनना केवल महत्वाकांक्षा नहीं था, बल्किएक शांत लेकिन स्पष्ट विद्रोह भी था।
उनके शुरुआती अनुभवों ने उन्हें एक गहरी उद्देश्य-बोध दिया।जब आप अभाव को करीब से देखते हैं, तो स्वास्थ्य सेवा केवल व्यवसाय नहीं रहती, वह एक मिशन बन जाती है।डीबीजी के जीवन में यह स्पष्ट दिखाई देता है- उन्हें चलने और सुनने में दिक्कत थी, और उनके बचपन के मित्र की टीबी के कारण मृत्यु हो गई, क्योंकि उनके गाँव राजगढ़ में पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएँ नहीं थीं।
यह केवल संयोग नहीं है कि उन्होंने हेल्थकेयर को चुना और टीबी की दवाइयों के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व स्थापित किया।हमारी शुरुआती परिस्थितियाँ हमारी सोच को उतना ही आकार देती हैं, जितना हम बाद में परिस्थितियों को बदलते हैं।
राजस्थान ने उन्हेंसंकटों को सहने की क्षमता और सोच‑समझकर निर्माण करने का दृष्टिकोणदिया। उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा कोनम्रता के साथ जिया, और एक नागरिक, एंटरप्रेन्योर, पति और पिता के रूप में अपनी भूमिकाओं को पूर्णता से निभाया।