हौसला बढ़ने में वक्त लगता है, लेकिन टूटता है एक झटके में : हर्ष सिंगला

Edited By Updated: 15 Sep, 2026 08:25 PM

it takes time to build confidence but it shatters in an instant harsh singla

सीएमटी फाउंडेशन ऑफ इंडिया के सह-संस्थापक एवं अध्यक्ष हर्ष सिंगला का कहना है कि दुर्लभ और लंबी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए हौसला सिर्फ मानसिक स्थिति नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी की दिशा तय करने वाली ताकत है। यही हौसला तय करता है कि मरीज बीमारी के...

नेशनल डेस्क : सीएमटी फाउंडेशन ऑफ इंडिया के सह-संस्थापक एवं अध्यक्ष हर्ष सिंगला का कहना है कि दुर्लभ और लंबी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए हौसला सिर्फ मानसिक स्थिति नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी की दिशा तय करने वाली ताकत है। यही हौसला तय करता है कि मरीज बीमारी के बावजूद अपनी जिंदगी में सक्रिय भागीदार बना रहेगा या धीरे-धीरे दूसरों पर निर्भर होता चला जाएगा। किसी भी मरीज के लिए आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता बनाए रखना इलाज और देखभाल जितना ही महत्वपूर्ण है।

किसी मरीज की निर्भरता अक्सर बहुत छोटे बदलावों से शुरू होती है। रोजमर्रा का कोई एक काम मुश्किल लगने पर वह उसे टाल देता है। इसके बाद धीरे-धीरे दूसरे काम भी छूटने लगते हैं और वह उन कामों के लिए भी दूसरों की मदद लेने लगता है, जिन्हें वह खुद कर सकता था। यह बदलाव इतना धीरे होता है कि कई बार मरीज और उसके परिवार को भी इसका एहसास नहीं होता।

माता-पिता और देखभाल करने वालों का प्यार और सहयोग जरूरी है, लेकिन कई बार यही देखभाल जरूरत से ज्यादा सुरक्षा में बदल जाती है। इसका असर मरीज के आत्मविश्वास और खुद पर भरोसे पर पड़ सकता है। इसलिए देखभाल का मकसद मरीज की जगह हर काम करना नहीं, बल्कि उसे अपनी क्षमता के अनुसार काम करने के लिए सक्षम बनाना होना चाहिए। आजादी सहारे के खिलाफ नहीं है, बल्कि अच्छे सहारे का अंतिम उद्देश्य ही व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाना है।

यह बात सिर्फ मरीजों और उनके परिवारों तक सीमित नहीं है। स्वास्थ्य सेवा, कारोबार, शोध, मरीजों के अधिकार, समाज सेवा, शिक्षा या परिवार—हर क्षेत्र में नेतृत्व करने वाले व्यक्ति के लिए भी हौसला जरूरी है। लोग किसी अगुआ की ओर इसलिए नहीं देखते कि उसके जीवन में मुश्किलें नहीं आतीं, बल्कि इसलिए देखते हैं क्योंकि वह मुश्किलों के बावजूद आगे बढ़ने का रास्ता दिखाता है।

दुर्लभ बीमारियों के क्षेत्र में यह जिम्मेदारी और भी बड़ी हो जाती है। मरीजों की आवाज उठाने वाले और संगठनों का नेतृत्व करने वाले कई लोग खुद मरीज या मरीजों के माता-पिता होते हैं। अपनी शारीरिक और भावनात्मक चुनौतियों के बावजूद वे सैकड़ों-हजारों परिवारों के लिए उम्मीद की वजह बनते हैं। वे डॉक्टरों और वैज्ञानिकों से संवाद करते हैं, नीतिगत बदलावों की मांग उठाते हैं, मरीजों का डेटा और रिकॉर्ड तैयार करते हैं, नए मरीजों के परिवारों को सहारा देते हैं और बेहतर इलाज की दिशा में लगातार प्रयास करते हैं।

लेकिन नेतृत्व करने वाला व्यक्ति भी आखिर इंसान ही होता है। जब वह खुद टूटने लगता है, तब यह समझना जरूरी हो जाता है कि हौसला फैलाने में समय और निरंतर प्रयास लगता है, जबकि निराशा बेहद तेजी से फैलती है। एक पल का संदेह या नकारात्मकता पूरे परिवार, संगठन या समुदाय के माहौल को प्रभावित कर सकती है। इसलिए अपने हौसले को बनाए रखना केवल व्यक्तिगत जरूरत नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है।

मैंने इससे क्या सीखा?

आगे बढ़ने और दूसरों का नेतृत्व करने की पहली शर्त खुद का हौसला बनाए रखना है। जो व्यक्ति खुद उम्मीद छोड़ चुका हो, वह लंबे समय तक दूसरों को प्रेरित नहीं कर सकता। इसी तरह मरीज को वह काम खुद करने देना चाहिए जिसे वह अपनी क्षमता के अनुसार कर सकता है, भले ही उसकी गति धीमी हो। सहारे का उद्देश्य मरीज की जगह लेना नहीं, बल्कि उसे सक्षम बनाना होना चाहिए।

समुदायों के लिए भी यही बात लागू होती है। मुश्किलों को स्वीकार करना जरूरी है, लेकिन निराशा को हावी होने देना नहीं। जो लोग लगातार दूसरों को हौसला देते हैं, उन्हें भी ऐसे लोगों और माहौल की जरूरत होती है जहां वे रुक सकें, अपनी ऊर्जा वापस पा सकें, कुछ नया सीख सकें और अपनी सोच को सही दिशा दे सकें।

स्वास्थ्य सेवा में अक्सर दवाओं, थेरेपी, तकनीक और शोध को प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन मरीज की प्रगति एक ऐसी ताकत पर भी निर्भर करती है जिसे न तो मापा जा सकता है और न ही छुआ जा सकता है- यह विश्वास कि सुधार संभव है।

यही विश्वास मरीज को रोज फिजियोथेरेपी करने की प्रेरणा देता है, परिवारों को सही निदान के लिए प्रयास जारी रखने की ताकत देता है और लोगों को शोध एवं जागरूकता अभियानों से जुड़ने के लिए प्रेरित करता है। यह मरीजों के अधिकारों की आवाज को मजबूत करने और जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

हर बातचीत, हर व्यवहार और हर प्रतिक्रिया किसी समुदाय का माहौल तैयार करती है। हम चाहें तो उम्मीद और हिम्मत फैला सकते हैं, या फिर शक और हार की भावना। हौसला फैलने में वक्त जरूर लगता है, लेकिन निराशा उससे कहीं तेज फैल सकती है।

इसलिए सवाल यह नहीं है कि हम दूसरों पर असर डालते हैं या नहीं। सवाल यह है कि हम अपने आसपास क्या फैला रहे हैं—उम्मीद या निराशा? मरीजों के अधिकारों की लड़ाई हो या नेतृत्व की चुनौती, सबसे जरूरी बात अपने हौसले को बचाए रखना है।

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