'शिक्षा नहीं, राजनीति का एजेंडा...', CBSE के यू-टर्न पर जयराम रमेश ने सरकार को घेरा

Edited By Updated: 04 Jun, 2026 11:06 PM

jairam ramesh corners government over cbse s u turn

कांग्रेस महासचिव एवं संचार प्रभारी जयराम रमेश ने अपने सोशल मीडिया के 'X' पर एक पोस्ट शेयर किया है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि दिसंबर 2025 में CBSE की गवर्निंग बॉडी की अर्धवार्षिक बैठक हुई थी। इस बैठक में गवर्निंग बॉडी ने विशेष तौर पर और स्पष्ट रूप...

नेशनल डेस्क : कांग्रेस महासचिव एवं संचार प्रभारी जयराम रमेश ने अपने सोशल मीडिया के 'X' पर एक पोस्ट शेयर किया है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि दिसंबर 2025 में CBSE की गवर्निंग बॉडी की अर्धवार्षिक बैठक हुई थी। इस बैठक में गवर्निंग बॉडी ने विशेष तौर पर और स्पष्ट रूप से अपनी पाठ्यक्रम समिति की उस सिफारिश को मंजूरी दी थी, जिसमें कहा गया था कि NCERT द्वारा भाषाओं की ग्रेडेड टेक्स्टबुक जारी किए जाने तक CBSE को अपनी मौजूदा अध्ययन व्यवस्था, “विशेष रूप से भाषा संबंधी प्रावधानों” के संदर्भ में, जारी रखनी चाहिए। इस निर्णय पर अब तबादला किए जा चुके CBSE के चेयरमैन और सचिव के हस्ताक्षर भी थे।

CBSE के OSM सिस्टम को लागू करने में दिखाई गई अक्षमता, जल्दबाजी और टेंडर प्रक्रिया में भ्रष्टाचार के अलावा, CBSE कक्षा 9 और 10 में तीन-भाषा फॉर्मूला को मनमाने तरीके से लागू करने को लेकर भी चर्चा में है। आखिर इस फैसले की पृष्ठभूमि क्या है?

दिसंबर 2025 में CBSE की गवर्निंग बॉडी की… pic.twitter.com/7kdBtOKnIL

— Jairam Ramesh (@Jairam_Ramesh) June 4, 2026

लेकिन मई 2026 में CBSE ने एक सर्कुलर जारी कर स्कूलों से कहा कि वे 1 जुलाई 2026 से कक्षा 9 और 10 के पाठ्यक्रम में तीसरी भाषा जोड़ें। इतना ही नहीं, CBSE ने स्कूलों को निर्देश दिया कि वे कक्षा 9 के छात्रों को तीसरी भाषा पढ़ाने के लिए NCERT की कक्षा 6 की किताबों का इस्तेमाल करें।

आखिर इन छह महीनों में ऐसा क्या बदल गया? NCERT ने अब तक कक्षा 9 और 10 के लिए तीसरी भाषा की कोई पाठ्यपुस्तक जारी नहीं की है। जिस निर्णय पर हस्ताक्षर करने वाले CBSE चेयरमैन और सेक्रेटरी तब भी अपने पदों पर बने हुए थे, उसी दौरान CBSE ने प्रभावी रूप से अपनी पाठ्यक्रम समिति की सिफारिश को पलट दिया, जबकि उसे उसकी अपनी गवर्निंग बॉडी द्वारा मंजूरी दी जा चुकी थी। आखिर CBSE ने यह यू-टर्न क्यों लिया और किसके आदेश पर लिया?

इस फैसले के पीछे कोई शैक्षणिक तर्क नहीं है। इससे शैक्षणिक कैलेंडर और स्कूलों की योजना व्यवस्था में अराजकता फैल रही है और लाखों छात्रों का शैक्षणिक भविष्य प्रभावित हो रहा है। यहां एजेंडा साफ तौर पर राजनीतिक दिखाई देता है।

स्पष्ट है कि शिक्षा मंत्रालय और CBSE जैसे उसके स्वायत्त संस्थान शिक्षा विशेषज्ञों की सलाह पर नहीं, बल्कि मोदी सरकार की राजनीतिक इच्छाओं और एजेंडे के अनुसार काम करते हैं। लेकिन जब जवाबदेही तय करने की बात आती है, तो CBSE चेयरपर्सन और सचिव जैसे अधिकारियों का तबादला कर दिया जाता है, जबकि प्रधानमंत्री की कैबिनेट में बैठे उनके राजनीतिक आकाओं को बचाया जाता है। मंत्री प्रधान, जिन्होंने खुद को एक ऐसे पॉलिटिकल हैक के रूप में पेश किया है, जिनमें न ईमानदारी है और न ही शैक्षणिक विशेषज्ञता के प्रति कोई सम्मान, उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए।

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