कबीर: वह स्वर जिसे दबा दिया गया, पर मरा नहीं

Edited By Updated: 11 Jun, 2025 06:46 PM

kabir the voice that was suppressed but did not die

'यदि कबीर की वाणी, शब्द और सखियां सत्ता के ठेकेदारों द्वारा न दबाई गई होतीं, तो आज से 500 वर्ष पूर्व ही भारत की तस्वीर कहीं अधिक सुंदर होती। समय जितना आगे बढ़ रहा है, हम उतने ही कबीर के निकट आते जा रहे हैं।'

नेशनल डेस्क: 'यदि कबीर की वाणी, शब्द और सखियां सत्ता के ठेकेदारों द्वारा न दबाई गई होतीं, तो आज से 500 वर्ष पूर्व ही भारत की तस्वीर कहीं अधिक सुंदर होती। समय जितना आगे बढ़ रहा है, हम उतने ही कबीर के निकट आते जा रहे हैं।'

भारत की संत परंपरा में संत कबीर का स्थान अत्यंत विशिष्ट और क्रांतिकारी है। वे केवल भक्ति के कवि नहीं थे, बल्कि अपने समय के धार्मिक, सामाजिक और बौद्धिक पाखंडों पर कठोर प्रहार करने वाले निर्भीक विचारक थे। उनका ज्ञान केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन नहीं था, बल्कि यह सामाजिक चेतना और मानवीय गरिमा का उद्घोष था।

कबीर का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने धर्म को आत्मचितन और आत्मानुभूति का विषय बनाया, न कि अंधभक्ति और कर्मकांड का। उनकी वाणी जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता के विरुद्ध विद्रोह का स्वर थी। उन्होंने ऊंच-नीच, छुआछूत और धर्म के नाम पर होने वाले भेदभाव को खुली चुनौती दी।

एक संक्रमणकाल में क्रांति की मशाल: 500 वर्ष पूर्व का भारत गहन संक्रमण और दमन काकाल देख रहा था। एक ओर धार्मिक कट्टरता के नाम पर का काल देख रहा था। एक ओर धार्मिक कट्टरता के नाम पर मुसलमान शासकों का दमनचक्र चल रहा थे, था, जो गैर-मुसलमानों को 'काफिर' समझते दूसरी ओर हिन्दू समाज में कुछ जातिवादी ठेकेदार थे, जो जन्म के अभिमान में अंधे होकर कर्म को तुच्छ मानते थे। ऐसे समय में कबीर ने अपनी निर्भीक वाणी से दोनों पक्षों को आईना दिखाया।

उन्होंने लिखा :'साधो देखो जग बौराना, सांच कहो तो मारन धावे, झूठे जग पतियाना।'

कबीर की वाणी: दमन और उपेक्षा की शिकारः कबीर ने कल्पित वाणियों और मनगढ़ंत धार्मिक मान्यताओं की तीखी आलोचना की। वे कहते हैं: 'कल्पित वाणी बिना पैरों के दसों दिशाओं में दौड़ती है, बिना बुद्धि के आंखों से संसार देखती है।' कबीर की वाणी सत्ता और वर्णवादियों को असहज करती थी, इसलिए उनकी साखियां, शब्द और रमैनी लंबे समय तक दबाई या अनदेखी की गई। यदि ऐसा नहीं होता, तो भारत की सामाजिक, राजनीतिक और नहीं होता, तो भारत की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक पूर्व धिक दिशा 5 शताब्दियों ही बदल चुकी होती।

अंधविश्वासों के विरुद्ध सत्य की मशाल : कबीर कहते हैं: 'माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर। आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर।' कबीर का स्पष्ट मत था कि कर्मकांड और रूढ़िवादी परंपराएं धर्म को बोझिल बना देती हैं। और समाज को पंगु कर देती हैं। उनके अनुसार, यदि इंद्रियां और मन नियंत्रण में नहीं हैं, तो सारी विद्या, विज्ञान, दर्शन और उपलब्धियां व्यर्थ हैं।

बीजक-एक जागरण ग्रंथ: 'बीजक' केवल एक आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति का दस्तावेज है। इसमें कबीर का दर्शन बिना किसी लाग-लपेट के सत्य को उजागर करता है। यह आमजन को झकझोर कर आत्मचितन के लिए प्रेरित करता है।

कबीर का पुनर्जागरण आज की आवश्यकता: आज भी भारतीय समाज में जाति, धर्म, भाषा और वर्ग के नाम पर भेदभाव व्याप्त है। जब तक यह भेदभाव नहीं टूटेगा, तब तक हम एक सभ्य और समतामूलक समाज की कल्पना नहीं कर सकते। यह भेक तभी समाप्त होगा, जब एक नई सामाजिक व्यवस्था जन्म लेगी और इस नई व्यवस्था का आधार संत साहित्य और उनके विचार होंगे।

नव पीढ़ी के लिए कबीर का संदेश: आज यह आवश्यक है कि कबीर, नानक, रविदास, दादू जैसे संत- महापुरूषों की जयंती औऱ पुण्यतिथियां केवल औपचारिकता न होकर ज्ञान  औऱ चेतना के उत्सव बनें। इससे नई पीढ़ी एक समरस, सभ्य और जागरूक समाज के निर्माण की दिशा में प्रेरित होगी। (प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा, अनुसूचित जाति मोर्चा, हरियाणा/पूर्व विधायक, पटौदी )

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