Edited By Anu Malhotra,Updated: 01 Oct, 2026 03:09 PM
कर्नाटक सरकार ने महंगी दवाओं, कैंसर की दवाओं, एंटीबायोटिक्स, मेडिकल डिवाइस और अस्पताल में इस्तेमाल होने वाले सामानों की खरीद लागत और अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच भारी अंतर पाया है। कुछ उत्पाद तो अपनी खरीद लागत से 50 गुना से भी ज़्यादा MRP पर बेचे...
बेंगलुरु: कर्नाटक सरकार ने महंगी दवाओं, कैंसर की दवाओं, एंटीबायोटिक्स, मेडिकल डिवाइस और अस्पताल में इस्तेमाल होने वाले सामानों की खरीद लागत और अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच भारी अंतर पाया है। कुछ उत्पाद तो अपनी खरीद लागत से 50 गुना से भी ज़्यादा MRP पर बेचे जा रहे थे।
इस बारे में कर्नाटक गृह मंत्रालय के आधिकारिक बयान में गुरुवार को कहा गया, "कर्नाटक के खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन (FDA) ने कैंसर के मरीज़ों का इलाज करने वाले अस्पतालों और अन्य जगहों के हालिया निरीक्षण के दौरान ये बातें पाईं। विभाग ने इस मुद्दे को केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और राष्ट्रीय फार्मास्युटिकल मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) के ध्यान में लाया है और मरीज़ों से ज़्यादा बिल वसूलने से रोकने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर दखल देने की मांग की है।"
विभाग के अनुसार, दवा कंपनियाँ अस्पतालों को कुछ दवाएं भारी छूट वाली संस्थागत कीमतों पर सप्लाई करती हैं, जबकि मरीज़ों से छपी हुई MRP या उसके आस-पास की कीमत पर बिल लिया जाता है। जाँच में 253 ऐसी दवाएँ पाई गईं जिनकी कीमतों में बहुत ज़्यादा अंतर था।
उदाहरण के लिए, क्रिटिकेयर द्वारा सप्लाई की जाने वाली 'गुफिपोल' (Gufipol) की खरीद लागत 86 रुपये थी, जबकि इसकी MRP 4,528 रुपये थी, जो 52.6 गुना का अंतर है। 'गुफिसाइक्लिन-50' (Guficycline-50) इंजेक्शन की खरीद लागत 160 रुपये थी और MRP 7,110 रुपये थी, जो 44.4 गुना का अंतर है। इसी तरह, 'टर्लिटिस' (Terlitis) की खरीद लागत 118 रुपये थी और MRP 4,416 रुपये थी, जबकि 'टैक्सोकेयर 120 mg' (Taxocare 120 mg) की खरीद लागत 1,000 रुपये थी और MRP 21,617 रुपये थी। जांच के दौरान पहचाने गए अन्य उत्पादों में कैनमैब 440 mg शामिल है, जिसकी लैंडिंग कॉस्ट ₹6,600 और MRP ₹57,457 थी, और बेवाटस 400 mg इंजेक्शन, जिसे ₹5,850 में खरीदा गया था जबकि इसकी MRP ₹62,690 थी।
अस्पताल में इस्तेमाल होने वाली चीज़ों में भी यह अंतर देखा गया। वयस्कों के लिए नेबुलाइज़र मास्क, जिसकी लैंडिंग कॉस्ट ₹44.50 थी, उसकी MRP ₹950 थी, जबकि ₹14.75 में खरीदे गए IV सेट की MRP ₹295 थी। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री यू.टी. खादर ने 23 सितंबर को लिखे एक पत्र में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री से दखल देने और अस्पतालों द्वारा संस्थागत कीमतों पर खरीदी गई दवाओं, मेडिकल डिवाइस और इस्तेमाल होने वाली चीज़ों के लिए मरीज़ों से ली जाने वाली ज़्यादा बिलिंग की समस्या को हल करने के उपाय करने की मांग की।
राज्य ने मरीज़ों के बिल पर लैंडिंग कॉस्ट और MRP दोनों का खुलासा अनिवार्य करने, ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) के तहत कीमत-नियंत्रित दवाओं का दायरा बढ़ाने, ज़रूरी महंगी दवाओं और इस्तेमाल होने वाली चीज़ों पर ट्रेड मार्जिन को नियंत्रित करने और इस मुद्दे का अध्ययन करने के लिए अंतर-मंत्रालयी विशेषज्ञ समूह बनाने की मांग की है। इसने ड्रग्स (प्राइसेस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 में संशोधन, ट्रेड मार्जिन को तर्कसंगत बनाने, कॉस्ट-टू-MRP पारदर्शिता, ज़रूरी दवाओं की राष्ट्रीय सूची का विस्तार और ऑडिट और प्रवर्तन तंत्र का प्रस्ताव भी दिया है।
FDA और ड्रग्स प्रवर्तन अधिकारियों ने 25 और 26 सितंबर को बेंगलुरु और कर्नाटक के विभिन्न जिलों में थोक विक्रेताओं के परिसरों, अस्पतालों और अन्य प्रतिष्ठानों में एक और विशेष सत्यापन अभियान चलाया।जांच में 768 से ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली चीज़ें और 189 महंगी दवाएं शामिल थीं। इसके नतीजे केंद्र सरकार को सौंपे जाएंगे।
विभाग ने कहा कि सत्यापन प्रक्रिया चरणों में जारी रहेगी, जिसमें अगला चरण एंटी-रेट्रोवायरल दवाओं, गंभीर और उच्च-पीढ़ी की एंटीबायोटिक्स, मेडिकल डिवाइस और अस्पताल में इस्तेमाल होने वाली उन चीज़ों पर केंद्रित होगा जिनसे मरीज़ों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है। कर्नाटक सरकार ने कहा कि वह स्वास्थ्य सेवा बिलिंग में पारदर्शिता लाने और मरीज़ों को अनावश्यक वित्तीय कठिनाई से बचाने के प्रयास जारी रखेगी।