Edited By Rahul Singh,Updated: 05 Oct, 2026 08:59 PM

जन्म प्रमाण-पत्र, जाति और आय प्रमाण पत्र, राशन से जुड़ी सेवाएं और दूसरी सरकारी सुविधाएं उन सेवाओं में शामिल हैं जिन्हें इस व्यापक ढांचे के तहत लाया जा रहा है। लेकिन सरकार सिर्फ आवेदन को डिजिटल करने से कहीं अधिक कुछ करने की कोशिश कर रही है।
बेंगलुरु : कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार अपनी सरकार की जनता-केंद्रित शासन की कोशिशों को एक राजनीतिक पहचान देने की कोशिश कर रहे हैं और इसी के तहत वह लोगों से अपील कर रहे हैं कि उन्हें‘राज्य का शासक'कहने की बजाय‘जनता का सेवक'कहकर बुलायें। उल्लेखनीय है कि उनकी यह अपील सिर्फ इस बारे में नहीं है कि मुख्यमंत्री को किस नाम से बुलाया जाए। यह ऐसे समय में आई है जब शिवकुमार की सरकार ‘जनता का सेवक' को एक खास प्रशासनिक पहल के तौर पर विकसित करना चाहती है, जिसका मकसद सरकारी सेवाओं और शिकायतों के समाधान को सीधे नागरिकों तक पहुंचाना है।

मैं जनता का सेवक हूं
शिवकुमार ने कहा है, 'मैं राज्य का शासक नहीं हूं। मैं जनता का सेवक हूं। अब से अगर आप मुझे ‘जनता का सेवक' कहकर बुलाएंगे, तो इससे बड़ी खुशी मेरे लिए और कोई नहीं होगी।' उन्होंने लोगों और नेताओं से सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनका परिचय देते समय इसी शब्द का इस्तेमाल करने का आग्रह किया है। शिवकुमार ने कर्नाटक के राजनीतिक इतिहास में अपनी छाप छोड़ने की बात कही है और‘जनता का सेवक'पहल उन्हें अपने कार्यकाल के साथ शासन की एक अलग पहचान जोड़ने का मौका देती है। इसकी अवधारणा बहुत सीधी है-किसी सरकारी सेवा को पाने या अपनी शिकायत का समाधान कराने के लिए नागरिक को एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय के चक्कर नहीं काटने चाहिए। ‘जनता का सेवक'को एक ‘सिंगल-विंडो' प्रणाली के तौर पर पेश किया जा रहा है, जो अलग-अलग सरकारी विभागों और सेवाओं को एक ही छत के नीचे लाता है। अलग-अलग प्रमाण-पत्र और सेवाओं के लिए तालुक कार्यालय, अस्पताल, राजस्व अधिकारी या किसी दूसरे विभाग के पास अलग-अलग जाने की बजाय नागरिकों के लिए पहुंच का एक ही जरिया होने की उम्मीद है। यह पहल पहले से चल रहे ‘सकाला' प्रणाली (नागरिक सेवा गारंटी प्रणाली) को और बेहतर बनाने की कोशिश है, जिसके तहत नागरिकों को तय समय-सीमा के भीतर खास सरकारी सेवाएं पाने का अधिकार है।

‘जनता की सेवा'इस नजरिए को और व्यापक बनाना चाहती है, जिसमें सेवा देने के साथ-साथ शिकायतों का समाधान और नागरिकों व प्रशासन के बीच सीधी बातचीत भी शामिल है। जन्म प्रमाण-पत्र, जाति और आय प्रमाण पत्र, राशन से जुड़ी सेवाएं और दूसरी सरकारी सुविधाएं उन सेवाओं में शामिल हैं जिन्हें इस व्यापक ढांचे के तहत लाया जा रहा है। लेकिन सरकार सिर्फ आवेदन को डिजिटल करने से कहीं अधिक कुछ करने की कोशिश कर रही है। ‘प्रजा सेवा अभियान'के ज़रिए प्रशासन शिकायतों के समाधान की प्रणाली जिलों और स्थानीय इलाकों तक ले जा रहा है, जहां मंत्री, चुने हुए प्रतिनिधि और अधिकारी सीधे नागरिकों से मिलते हैं और उनकी शिकायतें सुनते हैं। इस पहल में भ्रष्टाचार रोकने का पहलू भी शामिल है। शिवकुमार ने लोगों से सार्वजनिक रूप से अपील की है कि अगर अधिकारी सरकारी सेवाओं के लिए थोड़ी सी भी रकम मांगें तो वे उनसे संपर्क करें। यह बिचौलियों और छोटे-मोटे भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए नागरिकों की सीधी पहुंच का इस्तेमाल करने की कोशिश है। 1902 हेल्पलाइन इस प्रणाली का एक और हिस्सा है, जिससे नागरिक सरकारी सेवाओं से जुड़ी मदद मांग सकते हैं और शिकायतें दर्ज करा सकते हैं।

खुद को 'जनता का सेवक' कहना आसान है लेकिन...
शिवकुमार के लिए हालांकि असली राजनीतिक चुनौती वहीं से शुरू होती है जहां नारा खत्म होता है। खुद को 'जनता का सेवक' कहना आसान है लेकिन सरकार के कामकाज के ज़रिए उस पहचान को साबित करना कहीं अधिक मुश्किल है। नागरिक इस पहल को इस आधार पर परखेंगे कि क्या उन्हें सच में सरकारी कार्यालयों के बार-बार चक्कर लगाने से छुटकारा मिलता है, क्या आवेदनों का निपटारा तेज़ी से होता है, क्या अधिकारी शिकायतों पर जवाब देते हैं और क्या सेवाएं बिना बिचौलियों के लाभार्थियों तक पहुंचती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले इस्तेमाल किए गए शब्द‘प्रधान सेवक'से इसकी तुलना को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता। वर्ष 2014 में पद संभालने के बाद मोदी ने खुद को शासक की बजाय सेवक के तौर पर पेश करने की कोशिश की थी। शिवकुमार अब कर्नाटक के लिए खास शब्द‘जनता का सेवक'का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसे इसी नाम के एक संस्थागत कार्यक्रम से जोड़ रहे हैं।