जजों को PAN समेत टैक्स की जानकारी IT विभाग से साझा करने का आदेश, दिल्ली HC ने बताई वजह

Edited By Updated: 11 Aug, 2026 02:57 PM

order issued for judges to share tax details including pan with the it

दिल्ली उच्च न्यायालय ने न्यायिक भत्ता (ज्यूडिशियल अलाउंस) को लेकर आदेश दिया है।

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के उन जजों से अपनी टैक्स से जुड़ी कुछ जानकारी आईटी डिपार्टमेंट के साथ साझा करने को कहा है, जिनके टैक्स रिटर्न पर न्यायिक भत्ता (ज्यूडिशियल अलाउंस) को लेकर विवाद चल रहा है। कोर्ट ने कहा है कि संबंधित जजों की पहचान आसानी से हो सके ताकि उनके टैक्स रिटर्न की प्रोसेसिंग गलती से न रुक जाए। यह ऑर्डर जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता की डिवीजन बेंच ने 10 अगस्त को दिया। मामला जजों को मिलने वाले अलग-अलग भत्तों पर आयकर लगाने से जुड़ा है।

कौन-कौन सी जानकारी देनी होगी?

न्यायालय ने अपने पहले के आदेश के दायरे में आने वाले जजों के निजी सचिव को निर्देश दिया है कि वे संबंधित अधिकारी को ईमेल के जरिए कुछ जरूरी जानकारी भेजें। इसके लिए सूची बताई गई जिसमें शामिल हैं:

  1. जज का नाम
  2. असेसमेंट ईयर
  3. PAN नंबर
  4. टैक्स रिटर्न दाखिल करने की तारीख
  5. रिटर्न का एकनॉलेजमेंट नंबर

यह जानकारी 18 अगस्त तक भेजनी होगी। अगर इसके बाद कोई नया या संशोधित टैक्स रिटर्न दाखिल किया जाता है तो उसकी जानकारी भी 12 घंटे के भीतर देनी होगी।

क्यों जानकारी लेने की हुई जरूरत?

दरअसल, इस मामले में पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया था कि जिन जजों ने नई टैक्स व्यवस्था चुनी है और अपने कुछ भत्तों को टैक्स योग्य आय नहीं माना है, उनके रिटर्न की प्रोसेसिंग फिलहाल रोक दी जाए। इसके बाद इनकम टैक्स विभाग ने कोर्ट को बताया कि टैक्स रिटर्न का प्रोसेसिंग सिस्टम इलेक्ट्रॉनिक और केंद्रीकृत तरीके से चलता है। सिस्टम अपने आप यह पहचान नहीं कर सकता कि कौन सा रिटर्न किसी मौजूदा जज का है। ऐसे में अगर सभी रिटर्न की प्रोसेसिंग रोक दी जाती, तो इसका असर आम टैक्सपेयर्स पर भी पड़ सकता था। इसी समस्या को दूर करने के लिए कोर्ट ने संबंधित जजों की पहचान से जुड़ी जानकारी IT विभाग को देने का निर्देश दिया।

जजों के टैक्स रिटर्न का क्या होगा?

कोर्ट ने कहा है कि जिन जजों के रिटर्न की पहचान इस प्रक्रिया के जरिए हो जाएगी, उनकी प्रोसेसिंग फिलहाल नहीं की जाएगी। वहीं, अगर किसी जज के टैक्स रिटर्न की प्रोसेसिंग पहले ही हो चुकी है और उसके आधार पर टैक्स की मांग निकाली गई है, तो उस मांग को मामले पर अंतिम फैसला आने तक रोककर रखा जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा है कि मामले के लंबित रहने के दौरान संबंधित रिटर्न पर रिफंड जारी नहीं किया जाएगा। हालांकि, जो रिफंड पहले ही जारी हो चुके हैं, उनका अंतिम फैसला मामले के नतीजे पर निर्भर करेगा।

क्या है पूरा टैक्स विवाद?

यह विवाद जजों को मिलने वाले कुछ भत्तों पर टैक्स लगाने को लेकर शुरू हुआ। सितंबर 2025 में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने एक ऑफिस मेमोरेंडम जारी किया था। इसमें नई इनकम टैक्स व्यवस्था चुनने वाले जजों को मिलने वाले कुछ लाभों के टैक्स ट्रीटमेंट को लेकर स्थिति स्पष्ट की गई थी। इनमें सरकारी आवास, आने-जाने की सुविधा, आतिथ्य भत्ता और छुट्टी के दौरान यात्रा से जुड़ी सुविधाएं शामिल थीं। दिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन ने CBDT के इस आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी। एसोसिएशन का कहना था कि इन सुविधाओं को सामान्य टैक्स छूट या कटौती के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि जजों के वेतन और सेवा शर्तों से जुड़े कानून में इनका अलग प्रावधान है।

3 सितंबर को अगली सुनवाई

10 अगस्त की सुनवाई में इनकम टैक्स विभाग की परेशानी सामने आने के बाद कोर्ट ने अपने पहले के आदेश में जरूरी बदलाव किया है। अब संबंधित जजों की पहचान के लिए PAN और दूसरी जानकारी IT विभाग को दी जाएगी, ताकि केवल उन्हीं रिटर्न की प्रोसेसिंग रोकी जाए, जो इस मामले के दायरे में आते हैं।

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