Edited By Anu Malhotra,Updated: 20 Jun, 2026 09:00 AM

Pharma Industry: भारतीय दवा कंपनियों के लिए आने वाले चार से पांच साल बेहद अहम साबित हो सकते हैं। दुनिया की कई बड़ी और मशहूर दवाओं के पेटेंट खत्म होने वाले हैं, जिससे ग्लोबल फार्मा बाजार में नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना...
Pharma Industry: भारतीय दवा कंपनियों के लिए आने वाले चार से पांच साल बेहद अहम साबित हो सकते हैं। दुनिया की कई बड़ी और मशहूर दवाओं के पेटेंट खत्म होने वाले हैं, जिससे ग्लोबल फार्मा बाजार में नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव से भारतीय कंपनियां अरबों डॉलर का अतिरिक्त कारोबार हासिल कर सकती हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, 2026 से 2030 के बीच ऐसी कई दवाओं का पेटेंट समाप्त होगा जिनकी मौजूदा वार्षिक बिक्री अरबों डॉलर में है। पेटेंट खत्म होने के बाद अन्य कंपनियों को भी इनके विकल्प तैयार करने और बाजार में उतारने का मौका मिलेगा। इससे सस्ती दवाओं की उपलब्धता बढ़ेगी और जेनेरिक तथा बायोसिमिलर दवाओं का बाजार तेजी से विस्तार कर सकता है।
हालांकि इस बार स्थिति पहले के मुकाबले थोड़ी अलग है। पहले पेटेंट खत्म होने पर ज्यादातर छोटी मॉलिक्यूल वाली दवाओं के जेनेरिक संस्करण बाजार में आते थे, लेकिन अब बड़ी संख्या में बायोलॉजिकल दवाओं का पेटेंट समाप्त होने जा रहा है। इन दवाओं को विकसित करना, तैयार करना और उनकी समान गुणवत्ता बनाए रखना कहीं अधिक जटिल प्रक्रिया मानी जाती है।
बायोलॉजिकल दवाएं जीवित कोशिकाओं से तैयार की जाती हैं और इनके विकल्प यानी बायोसिमिलर विकसित करने में ज्यादा समय, निवेश और तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत होती है। यही वजह है कि केवल वे कंपनियां इस अवसर का पूरा लाभ उठा पाएंगी जिनके पास मजबूत रिसर्च, आधुनिक उत्पादन क्षमता और वैश्विक नियामक मानकों को पूरा करने का अनुभव होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में केवल कम लागत पर दवा बनाने वाली कंपनियां ही सफल नहीं होंगी, बल्कि बाजार में तेजी से उत्पाद लॉन्च करने वाली कंपनियों को भी बड़ा फायदा मिलेगा। कई दवाएं कैंसर, डायबिटीज और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों जैसी लंबी अवधि तक चलने वाली चिकित्सा श्रेणियों से जुड़ी हैं। ऐसे में जो कंपनी पहले बाजार में पहुंचेगी, उसके लिए डॉक्टरों और मरीजों के बीच मजबूत पकड़ बनाना आसान होगा।
विश्लेषकों के अनुसार, पेटेंट समाप्त होने वाले दवाओं के बाजार में सबसे बड़ा हिस्सा कैंसर उपचार से जुड़ी दवाओं का हो सकता है। इसके अलावा इम्यूनोलॉजी, डायबिटीज, मोटापा और हृदय संबंधी बीमारियों की दवाओं में भी बड़े अवसर देखने को मिल सकते हैं।
हालांकि भारतीय कंपनियों के लिए रास्ता पूरी तरह आसान नहीं होगा। मूल दवा विकसित करने वाली वैश्विक कंपनियां अपने बाजार हिस्से को बचाने के लिए कई रणनीतियां अपना सकती हैं। इनमें नए पेटेंट आवेदन, ब्रांड विस्तार, मूल्य निर्धारण में बदलाव और कानूनी समझौते जैसे कदम शामिल हो सकते हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है।
फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारतीय फार्मा कंपनियां अनुसंधान, उत्पादन और नियामक मंजूरी की दिशा में सही रणनीति अपनाती हैं, तो आने वाले वर्षों में यह अवसर उनके लिए बड़ा विकास इंजन साबित हो सकता है। इससे न केवल निर्यात बढ़ेगा बल्कि भारतीय फार्मा उद्योग की वैश्विक पहचान भी और मजबूत होगी।