Supreme Court का ऐतिहासिक फैसला: हजारों OBC उम्मीदवारों के लिए खुशखबरी, कोर्ट ने 'क्रीमी लेयर' के नियम बदले

Edited By Updated: 12 Mar, 2026 04:32 PM

sc changes creamy layer rules for obc candidates

Supreme Court of India ने OBC के क्रीमी लेयर और नॉन-क्रीमी लेयर निर्धारण को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि किसी उम्मीदवार को क्रीमी लेयर में रखना या नॉन-क्रीमी लेयर (NCL) में शामिल करना केवल उसकी या उसके माता-पिता की सैलरी के आधार...

OBC Creamy Layer: Supreme Court of India ने OBC के क्रीमी लेयर और नॉन-क्रीमी लेयर निर्धारण को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि किसी उम्मीदवार को क्रीमी लेयर में रखना या नॉन-क्रीमी लेयर (NCL) में शामिल करना केवल उसकी या उसके माता-पिता की सैलरी के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। जस्टिस P. S. Narasimha और जस्टिस R. Mahadevan की पीठ ने कहा कि 1993 में जारी मूल दिशा-निर्देशों के अनुसार पद की स्थिति, सेवा का स्तर और अन्य कारकों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

ग्रुप C और D कर्मचारियों की सैलरी नहीं जोड़ी जाएगी

अदालत ने कहा कि अगर किसी उम्मीदवार के माता-पिता सरकारी सेवा में ग्रुप-C या ग्रुप-D (क्लास III या IV) पदों पर काम करते हैं, तो उनकी सैलरी को क्रीमी लेयर की कैलकुलेशन में शामिल नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही कृषि से होने वाली आय को भी क्रीमी लेयर निर्धारण से पूरी तरह अलग रखने की बात कही गई है।

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अन्य स्रोतोंसे आय पर होगा मुख्य फोकस

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय परिवार की आय मुख्य रूप से अन्य स्रोतो से देखी जाएगी। इसमें व्यापार, संपत्ति, किराया या अन्य निजी आय शामिल होगी। यदि ऐसी आय 3 लगातार सालों के औसत में 8 लाख रुपये सालाना से कम है, तो उम्मीदवार नॉन-क्रीमी लेयर श्रेणी में आ सकता है।

2004 का सरकारी पत्र आंशिक रूप से अमान्य

अदालत ने Department of Personnel and Training (डीओपीटी) के वर्ष 2004 के उस पत्र के एक नियम को अमान्य कर दिया, जिसमें बैंक, निजी कंपनियों या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) के कर्मचारियों की सैलरी को क्रीमी लेयर में शामिल करने की बात कही गई थी। कोर्ट ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों और निजी या पीएसयू कर्मचारियों के बच्चों के साथ अलग-अलग मानदंड लागू करना भेदभावपूर्ण है।

पुराने मामलों की भी होगी दोबारा समीक्षा

अदालत ने निर्देश दिया है कि यह फैसला पिछली तारीख से भी लागू होगा। इससे उन उम्मीदवारों को राहत मिल सकती है जिन्हें पहले केवल सैलरी के आधार पर क्रीमी लेयर मान लिया गया था। डीओपीटी को 6 महीने के भीतर ऐसे मामलों की समीक्षा कर आवश्यक कदम उठाने को कहा गया है। जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त पद भी बनाए जा सकते हैं, ताकि अन्य कर्मचारियों की वरिष्ठता प्रभावित न हो।

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सिविल सेवा परीक्षाओं पर पड़ेगा असर

अब सिविल सेवा जैसी परीक्षाओं में जिला मजिस्ट्रेट या तहसीलदार द्वारा जारी वैध ओबीसी-एनसीएल प्रमाणपत्र को प्राथमिकता दी जाएगी। साथ ही केवल वेतन के आधार पर उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने की प्रक्रिया पर रोक लगेगी। इस फैसले से उन हजारों अभ्यर्थियों को राहत मिलने की उम्मीद है जो आरक्षण का लाभ पाने के बावजूद तकनीकी कारणों से इससे वंचित रह गए थे।

 

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