SC का ऐतिहासिक फैसला: 13 साल कोमा में रहने वाले हरीश राणा को कोर्ट ने दी 'पैसिव यूथेनेशिया' की इजाजत

Edited By Updated: 11 Mar, 2026 12:40 PM

supreme court grants first passive euthanasia for patient in vegetative state

भारत के न्यायिक इतिहास में एक अभूतपूर्व निर्णय लेते हुए उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को गरिमा के साथ मरने के अधिकार (Right to Die with Dignity) को फिर से परिभाषित किया है। कोर्ट ने 31 वर्षीय एक मरीज, जो पिछले 13 वर्षों से 'वेजिटेटिव स्टेट' (अचेतन...

नेशनल डेस्क: भारत के न्यायिक इतिहास में एक अभूतपूर्व निर्णय लेते हुए उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को गरिमा के साथ मरने के अधिकार (Right to Die with Dignity) को फिर से परिभाषित किया है। कोर्ट ने 31 वर्षीय एक मरीज, जो पिछले 13 वर्षों से 'वेजिटेटिव स्टेट' (अचेतन अवस्था) में था, के लिए 'पैसिव यूथेनेशिया' (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी है।

'होना या न होना': शेक्सपियर के उद्धरण से शुरुआत

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने इस संवेदनशील मामले की सुनवाई की। फैसले की शुरुआत करते हुए जस्टिस पारदीवाला ने शेक्सपियर के प्रसिद्ध संवाद "To be or not to be" का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि विभिन्न मेडिकल रिपोर्टों के आधार पर अब मरीज को क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन (CAN) देना उसके हित में नहीं है।

13 साल का लंबा इंतजार और माता-पिता का संघर्ष

यह मामला हरीश राणा का है, जो 2013 में एक इमारत से गिरने के बाद से ही अचेतन अवस्था में हैं। पिछले 13 सालों से उनके माता-पिता ने उनकी देखभाल की है। कोर्ट ने उनके धैर्य की सराहना करते हुए कहा, "आप अपने बेटे का साथ नहीं छोड़ रहे हैं, बल्कि आप उसे गरिमा के साथ विदा होने का अवसर दे रहे हैं।"

पैसिव यूथेनेशिया: क्या है कोर्ट का निर्देश?

पैसिव यूथेनेशिया वह प्रक्रिया है जिसमें मरीज को जीवित रखने वाले कृत्रिम उपकरणों या उपचार को हटा लिया जाता है ताकि उसे प्राकृतिक मृत्यु मिल सके।

  • AIIMS को निर्देश: कोर्ट ने एम्स (AIIMS) को मरीज को अपने पैलिएटिव केयर विभाग में शिफ्ट करने का निर्देश दिया है।

  • गरिमा का ख्याल: मेडिकल केयर को इस तरह हटाया जाएगा जिससे मरीज की गरिमा पूरी तरह सुरक्षित रहे।

'कॉमन कॉज' दिशा-निर्देशों का पहला पूर्ण क्रियान्वयन

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि हालांकि 'कॉमन कॉज बनाम भारत संघ' मामले में दिशा-निर्देश पहले ही दिए जा चुके थे, लेकिन यह भारत का पहला मामला है जहाँ उन नियमों को पूर्ण रूप से लागू किया जा रहा है। अक्टूबर 2024 में स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी ड्राफ्ट गाइडलाइन्स के तहत भी लाइफ सपोर्ट हटाने के लिए चार प्रमुख शर्तें तय की गई हैं, जिनमें मेडिकल बोर्ड की राय और मरीज/परिजनों की सहमति अनिवार्य है।

 

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