Consumer Protection Act: कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट से डॉक्टरों को बाहर रखने पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और NMC से मांगा जवाब

Edited By Updated: 11 Feb, 2026 10:42 AM

the supreme court has sought answers from the centre and the national medical

नई दिल्ली में एक अहम कानूनी बहस फिर से तेज हो गई है। डॉक्टरों और अस्पतालों को कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 2019 के दायरे से बाहर रखने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) को नोटिस जारी...

नेशनल डेस्क: नई दिल्ली में एक अहम कानूनी बहस फिर से तेज हो गई है। डॉक्टरों और अस्पतालों को कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 2019 के दायरे से बाहर रखने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) को नोटिस जारी किया है। अदालत ने दोनों पक्षों से इस मुद्दे पर जवाब मांगा है। फिलहाल डॉक्टर उपभोक्ता संरक्षण कानून के दायरे में आते हैं।

तीन जजों की बेंच ने मांगा जवाब
यह मामला एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स (इंडिया) द्वारा दायर रिट याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। याचिका में मांग की गई है कि स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की सेवाओं को कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत ‘सेवा’ की श्रेणी में न माना जाए और उपभोक्ता फोरम को डॉक्टरों के खिलाफ शिकायतें स्वीकार न करने का निर्देश दिया जाए। इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने सुनवाई करते हुए केंद्र और एनएमसी से जवाब तलब किया।


1995 के ऐतिहासिक फैसले का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1995 में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन बनाम वी.पी. शांता मामले में फैसला दिया था कि डॉक्टरों द्वारा दी जाने वाली चिकित्सा सेवाएं कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट की परिभाषा में ‘सेवा’ मानी जाएंगी। अदालत ने स्पष्ट किया था कि यदि कोई डॉक्टर सभी मरीजों को पूरी तरह मुफ्त सेवा नहीं देता या व्यक्तिगत सेवा के अनुबंध के तहत काम नहीं कर रहा है, तो उसकी सेवाएं उपभोक्ता कानून के दायरे में आएंगी। कानून की धारा 2(1)(o) के अनुसार ‘सेवा’ में बैंकिंग, बीमा, परिवहन, बिजली आपूर्ति, आवास निर्माण और अन्य सुविधाएं शामिल हैं। मुफ्त सेवा या व्यक्तिगत अनुबंध के तहत दी गई सेवा इस दायरे में नहीं आती।


बड़ी बेंच को भेजा गया था मामला, फिर बरकरार रहा फैसला
मई 2024 में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने 1995 के फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत बताते हुए इसे बड़ी बेंच के पास भेजा था। लेकिन बाद में तीन जजों की बेंच ने यह कहते हुए पुराने फैसले पर दोबारा विचार से इनकार कर दिया कि रेफरेंस की आवश्यकता नहीं है। इस तरह 1995 का निर्णय प्रभावी बना रहा।


याचिकाकर्ताओं की दलीलें क्या हैं
एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स का कहना है कि चिकित्सा पेशा सामान्य व्यावसायिक लेन-देन जैसा नहीं है। उनके अनुसार डॉक्टरों को अक्सर अनिश्चित परिस्थितियों में पेशेवर निर्णय लेने पड़ते हैं, जहां परिणाम पहले से तय नहीं होते। ऐसे में मेडिकल फैसलों की तुलना किसी व्यावसायिक सेवा से करना उचित नहीं है। याचिका में यह भी कहा गया है कि जिस तरह वकीलों को कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के दायरे से बाहर रखा गया है, उसी तरह डॉक्टरों को भी छूट मिलनी चाहिए। संगठन का तर्क है कि स्वास्थ्य सेवाओं को उपभोक्ता सेवा मानने से डॉक्टर और मरीज के बीच भरोसे का रिश्ता प्रभावित होता है।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी दावा किया है कि उपभोक्ता मामलों की बढ़ती संख्या के कारण डॉक्टर इलाज के दौरान जोखिम लेने से बचने लगे हैं, खासकर आपातकालीन स्थितियों में। उनका कहना है कि जटिल मेडिकल मामलों को समझने के लिए उपभोक्ता फोरम पर्याप्त रूप से विशेषज्ञ नहीं हैं। साथ ही, डॉक्टर पहले से ही नेशनल मेडिकल कमीशन के नियमन के तहत आते हैं और मेडिकल लापरवाही से निपटने के लिए अलग व्यवस्था मौजूद है।

फिलहाल कानून में कोई बदलाव नहीं
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर सुनवाई शुरू कर दी है और केंद्र व एनएमसी से जवाब मांगा है, लेकिन अभी तक कानूनी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। जब तक अदालत कोई नया फैसला नहीं देती, तब तक डॉक्टर और अस्पताल कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के दायरे में ही रहेंगे।

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