सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: फैसले रोककर बैठना “न्यायपालिका की बीमारी”, तुरंत इलाज जरूरी

Edited By Updated: 03 Feb, 2026 08:33 PM

supreme court slams delay in judgments calls it judiciary s disease

न्यायिक प्रक्रिया में हो रही देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (3 फरवरी 2026) को बेहद कड़ा रुख अपनाया।

नेशनल डेस्क: न्यायिक प्रक्रिया में हो रही देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (3 फरवरी 2026) को बेहद कड़ा रुख अपनाया। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालयों में सुनवाई पूरी होने के बाद महीनों तक फैसले सुरक्षित रखने और उन्हें अपलोड न करने की प्रवृत्ति को “पहचानी हुई बीमारी” बताते हुए कहा कि इसे अब किसी भी कीमत पर खत्म किया जाना चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा कि यह समस्या न्यायपालिका के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है और यदि समय रहते इस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो यह पूरे सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकती है।

झारखंड हाईकोर्ट के मामले पर सुनवाई

यह टिप्पणी CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान की। याचिका में झारखंड हाईकोर्ट का उदाहरण दिया गया, जहां 4 दिसंबर 2025 को एक रिट याचिका को मौखिक रूप से खारिज कर दिया गया था, लेकिन उसका लिखित आदेश अब तक वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की ओर से पेश वकील को निर्देश दिया कि अगले सप्ताह के अंत तक पूरा फैसला याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराया जाए। मामले को 16 फरवरी 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में दोबारा सूचीबद्ध करने का आदेश दिया गया है।

“देरी से कानून की गरिमा कमजोर होती है”

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि फैसलों में इस तरह की देरी सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई है। उन्होंने तर्क दिया कि समय पर निर्णय न मिलना कानून की गरिमा और नागरिकों के अधिकारों के साथ अन्याय है।

CJI सूर्यकांत की अहम टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश ने न्यायपालिका की कार्यशैली पर खुलकर बात की। कुछ जज बेहद मेहनती होते हैं, जो सुनवाई के बाद समय पर फैसला सुनाते हैं, लेकिन कुछ फैसलों को अनावश्यक रूप से लंबित रखते हैं। फैसला सुरक्षित रखकर महीनों तक न सुनाना एक “सिस्टमिक बीमारी” है, जिसका इलाज अब जरूरी हो गया है। अपने 15 वर्षों के हाईकोर्ट जज कार्यकाल में उन्होंने कभी फैसले को तीन महीने से ज्यादा लंबित नहीं रखा। बहस सुनने के बाद मामलों को “आगे के निर्देशों” के नाम पर टालना देरी का एक तरीका बन गया है। 7–8 फरवरी को होने वाली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों की कॉन्फ्रेंस में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया जाएगा।

पहले भी जारी हो चुके हैं निर्देश

गौरतलब है कि नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट्स से उन मामलों का ब्यौरा मांगा था, जिनमें फैसले सुरक्षित रखे गए हैं। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि हर प्रमाणित आदेश में तीन तारीखें अनिवार्य रूप से दर्ज हों। फैसला सुरक्षित रखने की तारीख,फैसला सुनाने की तारीख और फैसला अपलोड करने की तारीख। शीर्ष अदालत ने साफ किया कि यह टिप्पणी किसी एक जज या हाईकोर्ट के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र में मौजूद समस्या को सुधारने की कोशिश है।

आम नागरिकों के लिए क्यों अहम है यह टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट का यह सख्त रुख समयबद्ध न्याय की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। फैसलों में देरी का सीधा असर आम लोगों पर पड़ता है, जिनकी जिंदगी, नौकरी, संपत्ति और आज़ादी अदालत के फैसलों पर निर्भर होती है।

Related Story

Trending Topics

IPL
Royal Challengers Bengaluru

190/9

20.0

Punjab Kings

184/7

20.0

Royal Challengers Bengaluru win by 6 runs

RR 9.50
img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!