Edited By Rahul Singh,Updated: 14 Oct, 2026 01:18 PM

पीस बॉन्ड अदालत या एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किया जाने वाला एक कानूनी मुचलका होता है। इसके तहत किसी व्यक्ति को तय समय के लिए शांति बनाए रखने और अच्छा आचरण करने का वादा करना पड़ता है।
नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ आंदोलन करने वाले कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को बिना अनुमति जंतर-मंतर पर प्रवेश करने और बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करने के आरोप में न्यायिक हिरासत में ले लिया गया है। बुधवार को एक स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) कोर्ट ने दोनों नेताओं को 5 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है।
पूरा मामला क्या है?
10 अक्टूबर को विरोध प्रदर्शन के दौरान सीजेपी के फाउंडर अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिया गया था। अगले दिन यानी 11 अक्टूबर को उन्हें इस शर्त पर रिहा किया गया कि वे एक साल तक शांति भंग करने वाले किसी भी मामले में शामिल नहीं होंगे और इसके लिए 50-50 हजार रुपए का पीस बॉन्ड भरवाया गया था। हालांकि, सीजेपी नेता अभिजीत दिपके ने दावा किया था कि उन्होंने ऐसा कोई बॉन्ड साइन नहीं किया है जिसमें दोबारा प्रदर्शन करने पर रोक हो। सरकार ने 12 अक्टूबर को जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन स्थल के तौर पर डी-नोटिफाई कर दिया था। इसके बावजूद, अगले दिन यानी 13 अक्टूबर को सौरव दास, आशुतोष रांका और CJP कार्यकर्ता अजिंक्य शिंदे बैरिकेड्स लांघकर जंतर-मंतर के प्रतिबंधित इलाके में घुस गए और वहां तिरंगा लहराया। पुलिस ने तुरंत तीनों को हिरासत में ले लिया। इसके बाद कोर्ट ने सौरव और आशुतोष को बार-बार अपराध करने वाला मानते हुए 5 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है।
आखिर क्या होता है 'पीस बॉन्ड'?
पीस बॉन्ड अदालत या एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किया जाने वाला एक कानूनी मुचलका होता है। इसके तहत किसी व्यक्ति को तय समय के लिए शांति बनाए रखने और अच्छा आचरण करने का वादा करना पड़ता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के सेक्शन 126 के तहत मजिस्ट्रेट को यह अधिकार मिलता है। यदि किसी कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सूचना मिलती है कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है या अशांति फैला सकता है, तो मजिस्ट्रेट उसे नोटिस जारी कर एक साल तक की अवधि के लिए पीस बॉन्ड भरने का आदेश दे सकता है।