कलम का कारवाँ: हिंदी साहित्यकारों की लेखकीय यात्राओं को साहित्यसिंधिका ने बनाया प्रेरणादायी फुटप्रिंट

Edited By Updated: 26 Feb, 2026 12:51 AM

caravan of the pen sahityasindhika creates inspirational footprints of the writ

जमशेदपुर में आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम “कलम का कारवाँ: स्याही से शिखर तक का सफ़र” महज़ एक साहित्यिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि हिंदी साहित्य की उन अनकही और अनदेखी यात्राओं को सामने लाने की एक संवेदनशील और विचारोत्तेजक पहल बनकर उभरा, जिन्हें अक्सर मंच और...

(वेब डेस्क): जमशेदपुर में आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम “कलम का कारवाँ: स्याही से शिखर तक का सफ़र” महज़ एक साहित्यिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि हिंदी साहित्य की उन अनकही और अनदेखी यात्राओं को सामने लाने की एक संवेदनशील और विचारोत्तेजक पहल बनकर उभरा, जिन्हें अक्सर मंच और सुर्खियाँ नहीं मिल पातीं। साहित्यसिंधिका के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में लेखकों की रचनाओं से आगे बढ़कर उनकी जीवन-यात्रा, संघर्ष, असफलताओं और आत्मसंघर्ष को केंद्र में रखा गया। सामान्यतः साहित्यिक मंचों पर लेखक अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करते हैं, लेकिन यहाँ उन्होंने अपने जीवन के वे अनुभव साझा किए, जिनसे होकर उनकी लेखनी का निर्माण हुआ। मंच से साझा हुई इन कहानियों ने स्पष्ट किया कि साहित्य केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि अनुभव, पीड़ा, धैर्य और निरंतर साधना की यात्रा है। लेखकों की व्यक्तिगत संघर्ष-कथाएँ श्रोताओं के लिए प्रेरणादायी फुटप्रिंट बनकर सामने आईं। कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी रहा कि साहित्यिक पहचान और प्रतिष्ठा अचानक नहीं मिलती। इसके पीछे वर्षों की अस्वीकृति, आर्थिक चुनौतियाँ, सामाजिक दबाव और एकाकी संघर्ष छिपा होता है।

वरिष्ठ साहित्यकारों की सच्ची और बेबाक अभिव्यक्तियों ने उपस्थित श्रोताओं को भावुक ही नहीं किया, बल्कि आत्ममंथन के लिए भी प्रेरित किया। आज जब सोशल मीडिया और त्वरित लोकप्रियता साहित्य की दिशा प्रभावित कर रहे हैं, ऐसे समय में “कलम का कारवाँ” जैसी पहल साहित्य को मानवीय दृष्टि से देखने का अवसर प्रदान करती है। यह मंच लेखक को किसी आदर्श छवि में नहीं, बल्कि एक साधारण इंसान के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसकी सफलता के पीछे अथक संघर्ष और निरंतर साधना निहित होती है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जयनंदन, अन्नी अमृता और प्रतिभा प्रसाद ने अपने जीवन-संघर्ष और साहित्यिक अनुभवों से श्रोताओं को प्रेरित किया। कार्यक्रम का प्रभावशाली संचालन डॉ. अनीता निधि ने गरिमापूर्ण एवं सुसंगठित ढंग से किया। उन्होंने कहा कि एक लेखक की पहचान धैर्य, निरंतर अभ्यास और सामाजिक प्रतिबद्धता से निर्मित होती है। आमंत्रित साहित्यकारों डॉ. अरुण सज्जन, सोनी सुगंधा, सुधा गोयल, अजय कुमार प्रजापति, कमल किशोर वर्मा, माधुरी मिश्रा, डॉ. उदय प्रताप हयात और छाया प्रसाद ने भी अपनी संघर्ष-यात्राएँ साझा कीं। उनकी संवेदनशील अभिव्यक्तियों ने कार्यक्रम को भावनात्मक ऊँचाई प्रदान की।

कार्यक्रम के सफल संचालन और संवादात्मक प्रस्तुति में ह्यूमंस ऑफ जमशेदपुर की सक्रिय सहभागिता उल्लेखनीय रही। मानवीय कहानियों और सामाजिक सरोकारों को सामने लाने के लिए पहचाने जाने वाले इस मंच ने साहित्यसिंधिका के साथ मिलकर “कलम का कारवाँ” को जन-संवेदनशील स्वरूप प्रदान किया। साथ ही आयोजन को पूर्णतः ज़ीरो वेस्ट स्वरूप देने की दिशा में विशेष पहल की गई, जिसके तहत किसी भी प्रकार की प्लास्टिक वस्तु का उपयोग नहीं किया गया। यह पर्यावरण संरक्षण के प्रति आयोजकों की प्रतिबद्धता का स्पष्ट संदेश रहा। “कलम का कारवाँ” हिंदी साहित्य में एक ईमानदार संवाद की पहल है, जो लेखकों की व्यक्तिगत यात्राओं को नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा में बदल रहा है।

“साहित्यसिंधिका” के बैनर तले शुरू हुआ यह कार्यक्रम भविष्य में जमशेदपुर से आगे बढ़कर दिल्ली, मुंबई, बनारस और लखनऊ जैसे प्रमुख साहित्यिक केंद्रों तक पहुँचेगा। संस्थापक लेखक अंशुमन भगत इसे विभिन्न शहरों तक ले जाने की तैयारी कर रहे हैं, जहाँ वरिष्ठ और समकालीन साहित्यकार अपने जीवन के वे अनुभव साझा करेंगे, जो अक्सर किताबों में दर्ज नहीं हो पाते।

और ये भी पढ़े

    Related Story

      img title
      img title

      Be on the top of everything happening around the world.

      Try Premium Service.

      Subscribe Now!