‘न्यायपालिका द्वारा’ जन-हित व सकारात्मक फैसले!

Edited By Updated: 25 Oct, 2026 03:13 AM

public interest and positive decisions by the judiciary

आज जहां कार्यपालिका और विधायिका लगभग निष्क्रिय हो रही हैं, वहीं न्यायपालिका जन-हित के महत्वपूर्ण मुद्दों पर फैसले कर रही है। वर्ष 2026 में भारत के सुप्रीम कोर्ट तथा हाईकोर्टों द्वारा कई ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसले सुनाए गए हैं जिनमें से चंद निम्न...

आज जहां कार्यपालिका और विधायिका लगभग निष्क्रिय हो रही हैं, वहीं न्यायपालिका जन-हित के महत्वपूर्ण मुद्दों पर फैसले कर रही है। वर्ष 2026 में भारत के सुप्रीम कोर्ट तथा हाईकोर्टों द्वारा कई ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसले सुनाए गए हैं जिनमें से चंद निम्न में दर्ज हैं : 

* 18 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने एक सर्कुलर जारी कर बिना किसी ठोस कारण के सुनवाई टालने पर रोक लगा दी क्योंकि यह न्याय प्रणाली में देरी का मुख्य कारण बनता है और इससे लोगों के तेजी से न्याय पाने के अधिकार का उल्लंघन होता है।
* 29 मई को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ‘सूर्यकांत’ तथा जस्टिस ‘जॉयमाल्या बागची’ ने देश के सभी हाईकोर्टों को किसी भी मामले में फैसला सुरक्षित रखने के 3 महीनों के भीतर अनिवार्य रूप से फैसला सुनाने तथा इसके साथ ही जमानत के आदेश उसी दिन या अगले दिन तक जेल प्रशासन को भेजने का आदेश दिया ताकि कैदी तुरंत रिहा हो सकें।
* 2 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ‘पी.एस. नरसिम्हा’ तथा जस्टिस ‘आलोक अराधे’ की पीठ ने कानूनी कार्रवाइयों में  ‘आर्टीफिशियल इंटैलीजैंस’ (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) द्वारा बनाए गए फर्जी या मनगढ़ंत ‘हवालों’ के इस्तेमाल पर गहरी ङ्क्षचता जताई और कहा कि अदालतों और ट्रिब्यूनलों को ऐसे फर्जी उद्धरणों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने न्यायिक निर्णय की पवित्रता बनाए रखने के लिए कुछ निर्देश भी जारी किए।

* 28 सितम्बर को तिहाड़ जेल के एक कैदी की पिटाई के संबंध में जेल वार्डन तथा सम्बन्धित अधिकारियों को भविष्य में कड़ी कार्रवाई की चेतावनी देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस ‘प्रतिभा सिंह’ और जस्टिस ‘दिनेश भट्टï’ ने कहा कि जेल अधिकारियों द्वारा कैदियों के विरुद्ध बेवजह ङ्क्षहसा का इस्तेमाल कतई मंजूर नहीं है और भविष्य में यदि ऐसा व्यवहार दोहराया गया तो अदालत कड़ा कदम उठाने से संकोच नहीं करेगी। 
* 29 सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ‘विक्रम नाथ’ और जस्टिस ‘संदीप मेहता’ की पीठ ने दवाओं पर मुनाफाखोरी को लेकर गहरी ङ्क्षचता व्यक्त करते हुए केंद्र सरकार से सवाल किया कि 2700 रुपए की दवा पर एम.आर.पी. 27,000 रुपए क्यों है? 
उन्होंने इसे ‘जनसंहार’ और ‘दिन दिहाड़े डकैती’ करार दिया तथा पूछा कि इतना पैसा कहां जा रहा है और इससे किसे लाभ हो रहा है? इसके साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार को सभी दवाओं पर एक समान माॢजन 16 प्रतिशत रखने के विकल्प पर विचार करने को कहा।
* 5 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ‘पी.एस. नरसिम्हा’ और जस्टिस ‘आलोक आराधे’ की पीठ ने केंद्र सरकार को आदेश दिया कि जहां-जहां सड़क है वहां फुटपाथ भी हो और ये फुटपाथ स्पष्टï रूप से सीमांकित तथा अतिक्रमण से मुक्त होने चाहिएं ताकि आम नागरिकों को सुरक्षित चलने का उनका अधिकार मिल सके क्योंकि पैदल चलना और सीमांकित फुटपाथ पर चलना जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। 

* 5 अक्तूबर को ही सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ‘जे.बी. पारदीवाला’ और जस्टिस ‘के. विनोद चंद्रन’ ने महिलाओं के विरुद्ध तेजी से बढ़ रहे अपराधों पर कहा कि अपराधियों के मन में कानून का डर पैदा होना चाहिए और यह लगना चाहिए कि अगर वे कुछ गलत करेंगे तो मारे जाएंगे। इसके लिए पुलिस को सख्त होना होगा व महिलाओं की सुरक्षा यकीनी बनाने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे, सिर्फ सी.सी.टी.वी. कैमरे लगाना काफी नहीं है।
* 12 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों में भारी अंतर तथा व्यापारिक माॢजन पर नियंत्रण केवल कैंसर की दवाओं पर क्यों है? अन्य दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों में भी खरीद मूल्य और और अधिकतम खुदरा मूल्य (एम.आर.पी.) के बीच बड़े अंतर की जांच होनी चाहिए।
जस्टिस ‘विक्रम नाथ’ और जस्टिस ‘संदीप मेहता’ की पीठ ने केंद्र के उस प्रस्ताव पर सवाल उठाए जिसके अंतर्गत कैंसर की चुङ्क्षनदा दवाओं पर व्यापारिक माॢजन 30 प्रतिशत तक करने की बात कही गई थी।

* और अब 18 अक्तूबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने बलात्कार की शिकार एक 16 वर्षीय नाबालिगा को 31 सप्ताह की प्रैगनैंसी समाप्त करने की अनुमति दी है। अदालत ने कहा कि नाबालिग से बच्चे को जन्म देने और उसकी परिवरिश का बोझ उठाने की आशा करना उचित नहीं होगा। उल्लेखनीय है कि कानून में 24 सप्ताह तक का गर्भ समाप्त करने की छूट है। अदालत ने गर्भपात का खर्च उठाने का भी राज्य सरकार को आदेश दिया है।
डा. भीमराव आम्बेडकर के अनुसार संविधान न्यायपालिका का दिल और आत्मा है। वह नागरिकों के बुनियादी अधिकारों का संरक्षक तथा ‘गारंटर’  (उसके प्रति जिम्मेदार) है और अब लगता है कि न्यायपालिका अपनी यह जिम्मेदारी बखूबी निभा रही है जो उक्त उदाहरणों से स्पष्टï है।—विजय कुमार

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