भारत की कृषि गाथा का नया रूप : परिवर्तन का एक दशक

Edited By Updated: 24 Oct, 2026 05:24 AM

india s new agricultural story a decade of change

जब माननीय प्रधानमंत्री ने वर्ष 2014 में पदभार संभाला, तब कृषि और किसान कल्याण को भारत के विकास एजैंडे के केंद्र में रखा गया। वर्ष 2015 से यह प्रतिबद्धता उत्पादन और कृषि आय में सुधार से आगे बढ़कर कृषि क्षेत्र को अधिक उत्पादक, सुदृढ़,...

जब माननीय प्रधानमंत्री ने वर्ष 2014 में पदभार संभाला, तब कृषि और किसान कल्याण को भारत के विकास एजैंडे के केंद्र में रखा गया। वर्ष 2015 से यह प्रतिबद्धता उत्पादन और कृषि आय में सुधार से आगे बढ़कर कृषि क्षेत्र को अधिक उत्पादक, सुदृढ़, प्रौद्योगिकी-आधारित और टिकाऊ बनाने के व्यापक परिवर्तन में परिलक्षित हुई है। प्रधानमंत्री ने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि ‘विकसित भारत के लिए भारतीय कृषि का भी विकास होना चाहिए।’ उन्होंने यह भी आह्वान किया है कि भारत केवल अपनी खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित न रहे, बल्कि वैश्विक खाद्य आपूर्तिकत्र्ता के रूप में उभरे। 

खाद्य सुरक्षा से कृषि के नए प्रतिमान तक : यह विजन भारतीय कृषि को देखने के हमारे दृष्टिकोण में निर्णायक बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है। हरित क्रांति ने भारत को खाद्य सुरक्षा प्रदान की। आज हमारी जिम्मेदारी पोषण सुरक्षा, किसानों की समृद्धि, संसाधन सुरक्षा और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता की मजबूत नींव तैयार करना है। कभी खाद्य आयात पर निर्भर रहने वाला भारत कुछ ही दशकों में प्रमुख अनाजों के मामले में आत्मनिर्भर बन गया। हरित क्रांति को विज्ञान, उन्नत बीजों, सिंचाई, बुनियादी ढांचे, संस्थागत ऋण, कृषि विस्तार सेवाओं और नीतिगत सहायता से गति मिली। 

कृषि विकास की औसत दर 1967-1995 के दौरान लगभग 2.7 प्रतिशत और 1996-2014 के दौरान लगभग 3.0 प्रतिशत थी। यह 2015-2025 के दौरान बढ़कर लगभग 4.5 प्रतिशत हो गई। खाद्यान्न उत्पादन में 8.4 मिलियन टन प्रतिवर्ष, फल एवं सब्जियों में 7.6 मिलियन टन प्रतिवर्ष तथा दूध में भी अच्छी वृद्धि दर्ज की गई। पिछले दो वर्षों में खाद्यान्न उत्पादन में असाधारण वृद्धि दर्ज की गई, जो प्रति वर्ष 22.1 मिलियन टन रही और पिछले वर्षों की तुलना में बहुत अधिक है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह वृद्धि अब व्यापक आधार पर हो रही है और इसे केवल अनाज ही नहीं, बल्कि बागवानी, डेयरी, मत्स्य पालन, कुक्कुट पालन तथा अन्य उच्च-मूल्य वाले कार्यकलापों से भी बल मिल रहा है। यही कृषि भारत के विकास के अगले चरण को गति देगी।

हमारा उद्देश्य अब केवल अधिक उत्पादन तक सीमित नहीं होना चाहिए। हमें कम संसाधनों, कम पानी, कम भूमि, कम ऊर्जा और अनावश्यक कृषि आदानों के कम उपयोग के साथ अधिक उत्पादन करना होगा, साथ ही बेहतर गुणवत्ता वाला, सुरक्षित और अधिक पौष्टिक खाद्य तैयार करना होगा। भारत में उपभोग के बदलते स्वरूप से भी इसका स्पष्ट संकेत मिलता है। ग्रामीण भारत में 1972-73 में खाद्य व्यय का लगभग 57 प्रतिशत हिस्सा अनाज पर खर्च होता था। 2022-23 तक यह घटकर लगभग 11 प्रतिशत रह गया। इसी अवधि में दूध और दुग्ध उत्पादों, फलों, सब्जियों, अंडों, मांस और मछली का हिस्सा लगभग 20 प्रतिशत से बढ़कर करीब 48 प्रतिशत हो गया। 

हमारी कृषि को इस नए भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप ढलना होगा। किसानों को उन मूल्य शृंखलाओं से जोडऩा आवश्यक है, जहां वास्तविक आर्थिक अवसर तेजी से ग्रेडिंग, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, लॉजिस्टिक्स और निर्यात में केंद्रित हो रहे हैं। भारत सरकार ने इस बदलाव के लिए महत्वपूर्ण आधार तैयार किया है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना जल के कुशल उपयोग को बढ़ावा दे रही है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड पहल ने मिट्टी की जांच और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन को कृषि संबंधी निर्णयों के केंद्र में रखा है। पी.एम. कुसुम कृषि को नवीकरणीय ऊर्जा से जोड़ रही है। ई-नाम कृषि बाजारों को डिजिटल रूप से जोड़ रहा है, जबकि कृषि अवसंरचना कोष, प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना और पी.एम.एफ.एम.ई. फसल कटाई के बाद की अवसंरचना और प्रसंस्करण को मजबूत कर रहे हैं। 

अगली कृषि क्रांति उत्कृष्टता, लचीलेपन और ज्ञान की क्रांति होनी चाहिए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रिमोट सैंसिंग, ड्रोन, जीनोमिक्स, जैव-प्रौद्योगिकी, डिजिटल परामर्श प्रणालियां और भू-स्थानिक प्रौद्योगिकियां किसानों को बुवाई, सिंचाई, पोषक तत्वों, कीटों, मौसम और बाजारों के बारे में बेहतर निर्णय लेने में मदद कर सकती हैं। डिजिटल कृषि पहल, एग्रीस्टैक और ए.आई.-सक्षम परामर्श मंच कृषि सेवाओं को अधिक लक्षित और सुलभ बना सकते हैं। हालांकि, प्रौद्योगिकी तभी परिणाम देगी, जब वह किसान तक सरल, किफायती और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप पहुंचेगी।

कृषि के अगले परिवर्तन को भारत की समृद्धि, पोषण, प्राकृतिक संसाधनों और वैश्विक नेतृत्व को सुरक्षित करना होगा। हमारा दायित्व है कि विज्ञान, नवाचार, अवसंरचना, बाजार, संस्थानों और सबसे बढ़कर प्रत्येक कृषि नीति के केंद्र में भारतीय किसान को रखकर इस विजन को कार्यरूप दें। विकसित भारत 2047 की ओर बढ़ते हुए किसान केवल विकास का लाभार्थी न रहे, बल्कि भारत के विकसित भविष्य का निर्माता भी बने। भारत को अब कृषि में इसी परिवर्तन की दिशा में आगे बढऩा है और 2047 के भारत की नींव इसी पर टिकेगी।-शिवराज सिंह चौहान (केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री)

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