नौकरियां बढ़ने की बजाय और कम हो गईं

Edited By Updated: 19 Jun, 2022 04:16 AM

instead of increasing jobs have decreased

20 फरवरी 2022 को छपे मेरे आलेख को पढऩे के बाद सरकार ने मेरी खुशामद की। अंतत: बेरोजगारी बढऩे की वास्तविकता को जानने के बाद सरकार ने घोषणा की है कि केंद्र सरकार के अंतर्गत

20 फरवरी 2022 को छपे मेरे आलेख को पढऩे के बाद सरकार ने मेरी खुशामद की। अंतत: बेरोजगारी बढऩे की वास्तविकता को जानने के बाद सरकार ने घोषणा की है कि केंद्र सरकार के अंतर्गत 10 लाख लोगों की भर्ती की जाएगी। कुछ अपवादों को छोड़ प्रत्येक परिवार नौकरियों की कमी के चलते प्रभावित हुआ है। नौकरियों में कमी देखी गई है, विशेषकर महामारी से प्रभावित और उदासीन रिकवरी वर्ष (2020-21) के बाद। भारत ने बेरोजगारी के रूप में एक बड़ी आर्थिक चुनौती झेली है। 

2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने एक बहुत बड़ा वायदा किया कि वे एक वर्ष में 2 करोड़ नौकरियां पैदा करेंगे। यहां पर संशय था मगर मोदी में विश्वास रखने वाले उनके भक्तों द्वारा बजाए गए ड्रमों की थाप ने आवाजों को दबा दिया। ‘‘विदेशों में जमा काला धन वापस देश में लाएंगे तथा प्रत्येक भारतीय के खाते में 15 लाख रुपए जमा करवाने’’ जैसी मानसिकता को भड़काने वाले वायदों सहित  भक्तों ने प्रत्येक वायदे को निगल लिया। मुझे आशंका है कि शायद ही किसी का गणित दुरुस्त हो। 

नई सरकार के सत्ता को संभालने के बाद प्रत्येक वर्ष 2 करोड़ नौकरियों के सृजन तथा प्रत्येक भारतीय के खाते में 15 लाख रुपए जमा करवाएंगे, जैसी सभी बातें समाप्त हो गईं। आमतौर पर लोग माफ कर देते हैं। सरकार यू.पी.ए. की स्कीमों को नया नाम देने तथा उन स्कीमों को अपना बनाने के दावे में व्यस्त रहे। गरीबों को नौकरी देने का मनरेगा जैसा अंतिम प्रयास मोदी सरकार ने जारी रखा क्योंकि सरकार इसके लिए कोई विकल्प वाली स्कीम को खोज न सकी। 

बद से बदत्तर : बेरोजगारी की स्थिति भी बदत्तर हो गई। यहां पर दो विश्व द्वारा इस्तेमाल मानक है। एक तो टोटल लेबर फोर्स तथा दूसरा लेबर फोर्स पार्टीस्पेशन रेट (एल.एफ.पी.आर.)। भारत में टोटल लेबर फोर्स 430 मिलियन है जबकि एल.एफ.पी.आर. टोटल लेबर फोर्स का अनुपात है जोकि वर्तमान में रोजगार पर है या फिर रोजगार को ढूंढ रहा है। यह प्रतिशत मई 2022 में 42.13 प्रतिशत था (स्रोत : सी.एम.आई.ई.) विश्व में यह सबसे बदत्तर प्रतिशत है (अमरीका में 63 प्रतिशत)। सी.एम.आई.ई. ने सारांश निकाला कि लाखों लोगों ने श्रम बाजार को छोड़ दिया और यहां तक कि उन्होंने नौकरियों की ओर देखना ही छोड़ दिया। नौकरी की तलाश करना निश्चित तौर पर निराश कर देने वाली बात है क्योंकि लोगों का मानना है कि देश में नौकरियां उपलब्ध ही नहीं हैं। निम्रलिखित आंकड़े यह बात दर्शाते हैं:

-परिवारों का शेयर                             प्रतिशत
कोई भी रोजगार वाला व्यक्ति नहीं         7.8
रोजगार पर एक व्यक्ति                      68.0
2 या उससे ज्यादा रोजगार                 24.2
पर लगे लोग

इसके अलावा केवल 20 प्रतिशत वेतन पाने वाली नौकरियां हैं। 50 प्रतिशत स्वयं रोजगार हैं तथा बाकी के लोग रोजाना कमाने वाले श्रमिक हैं। सी.एम.आई.ई. के कंज्यूमर पिरामिड्स हाऊस होल्ड सर्वे के अनुसार जून 2021 में परिवार की मासिक आय 15000 रुपए थी तथा उपभोक्ता खर्च 11000 रुपए था। ऐसे अनिश्चित घरेलू बाजार में जहां एक ही परिवार में रोजगार पर लगे व्यक्ति ने अपना रोजगार खो दिया जोकि महामारी से प्रभावित वर्ष में हुआ। ऐसा परिवार गरीबी तथा लाचारी में फंस कर रह गया। गरीब लोग तो और भी ज्यादा प्रभावित हुए। 

आंकड़े दर्शाते हैं कि कुपोषण तथा भुखमरी बहुत ज्यादा बढ़ गई। 2014 से लेकर 8 वर्षों में लाखों लोगों ने अपना रोजगार खो दिया जबकि कुछ ही नौकरियों को पैदा किया गया। इसके अलावा एल.एफ.पी.आर. घट गया तथा बेरोजगारी बढ़ गई। हमने आवाज बुलंद की मगर सरकार टस से मस न हुई। सरकार ने क्षमता वाले आंकड़ों में शरण ही ले ली। एक समय पकौड़े बेचना एक नौकरी मान लिया गया। 

सामान्य नजरों से ओझल : 20 फरवरी 2022 को मैंने अपने आलेख में लिखा कि नौकरियां सामान्य नजरों से ओझल हो गईं। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार देश में सरकार में 34,55,000 स्वीकृत पद थे। मार्च 2020 में देश में 8,72,243 नौकरियां थीं जिनमें से 7,56,146 तो ग्रुप सी में थीं (स्रोत : द हिंदू) प्रत्येक वर्ग प्रभावित हुआ मगर सबसे ज्यादा अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति। यदि अगले 18 महीनों में 10 लाख लोग भर्ती होंगे तो यह एक अच्छी शुरूआत है मगर नौकरियों में कुल जोड़ पहले से ही 10 लाख-8,72,243=1,27,757 है। 

सरकार को और ज्यादा करना चाहिए। यहां पर देश में लाखों नौकरियां हैं जिन्हें या तो चिन्हित करना है या फिर खोजी गई हैं या उनको पैदा किया गया है जैसे शिक्षक, शोधकत्र्ता, लाइब्रेरियन, खेल कोच, ट्रेनर, फिजियो थैरापिस्ट, कौंसलर्स, डाक्टर्स, नर्सें, पैरामैडिक्स, लैब टैक्नीशियन, सैनीटेशन वर्कर्स, सिटी प्लैनर्स, आर्कीटैक्ट, कृषि विस्तार अधिकारी, फूड प्रोसैसर, जानवरों के डाक्टर, मछली पकडऩे वाले इत्यादि। विकासशील देशों में यह जरूरी नौकरियां हैं। सरकार ऐसे मौकों से अनभिज्ञ है। 

भारत से बाहर नौकरियां : नौकरियों का एक बड़ा हिस्सा सरकार से बाहर है। वे प्राइवेट सैक्टर में हैं विशेषकर ऐसे क्षेत्रों में जो अभी तक खोजे नहीं गए। जैसे समुद्र, नदियां, जलस्रोत तथा ड्राइलैंड एग्रीकल्चर। देश में ऐसी बड़़ी आबादी है जो अभी तक संतुष्ट ही नहीं। उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए यहां तक कि आंशिक तौर पर हमें लाखों नौकरियों को पैदा करने की जरूरत है। निजी परिवहन की बात करें तो 24.7 प्रतिशत परिवारों के पास अपनी कार, मोटर बाइक या फिर साइकिल भी नहीं है। उष्णकटिबंधीय देश में मात्र 24 प्रतिशत परिवारों के पास अपना एयर कंडीशनर या फिर कूलर है। ऐसी जरूरी वस्तुओं को परिवारों के लिए खरीदने की सामथ्र्य कीमत पर देश की विर्निर्माण क्षमता हजारों नौकरियों को पैदा कर सकती है और उनका जीवन खुशहाल कर सकती है। 

नौकरियां पैदा करना मोदी सरकार का एक ही लक्ष्य होना चाहिए मगर ऐसा नहीं था। सरकार ने 8 वर्ष बेकार कर दिए। इसने अपनी सामाजिक तथा राजनीतिक पूंजी को लोगों को बांटने में लगा दिया। गलत नीतियों के कारण एक बंटा हुआ भारत आर्थिक तौर पर भी भुगत रहा है। 10 लाख सरकारी नौकरियां जख्मों पर मरहम नहीं लगाएंगी और न अर्थव्यवस्था को पहुंची क्षति की मुरम्मत करवाएंगी। यहां बहुत ज्यादा देर हो चुकी है।-पी चिदंबरम


 

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