Edited By ,Updated: 30 Aug, 2026 02:24 AM

नेपाल में आई बाढ़ से हुई विध्वंसक तबाही ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। भले ही घटना प्राकृतिक रही लेकिन वास्तविक कारणों में कहीं न कहीं मानवीय जिद भी जरूर है। इस तबाही का केन्द्र बिन्दू तिब्बत (चीन) का ऊपरी पहाड़ी क्षेत्र रहा, जहां ल्हेंदे नदी के...
नेपाल में आई बाढ़ से हुई विध्वंसक तबाही ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। भले ही घटना प्राकृतिक रही लेकिन वास्तविक कारणों में कहीं न कहीं मानवीय जिद भी जरूर है। इस तबाही का केन्द्र बिन्दू तिब्बत (चीन) का ऊपरी पहाड़ी क्षेत्र रहा, जहां ल्हेंदे नदी के पास एक बड़े ग्लेशियर के ढहने से भारी सैलाब आया। इसकी धमक इतनी ज्यादा थी कि शुरू में भूकंप का भ्रम हुआ। हालांकि कुछ घंटों बाद भूकंप भी आया, जिसने एक नया खौफ पैदा कर दिया। इस आपदा का ऐसा खौफनाक रूप दिखा, जिसने हर तरफ सिर्फ मलबा, मौत, चीख-पुकार का मंजर दिखाया। नेपाल की भयावह तस्वीरों ने सबको हिला कर रख दिया। अभी मौत के प्रारंभिक आंकड़े भले ही कम (500 से अधिक) हों लेकिन ये कितना बढ़ेंगे इस बात का अंदाजा नहीं है। करीब 2000 से ज्यादा लोग लापता हैं। इसमें ज्यादातर भारतीय हैं, जिनकी संख्या 300 के लगभग है। इनमें कुछ तो प्रतिष्ठित आई.टी. कंपनी के हैं। अब तक 84 भारतीयों को सुरक्षित बचा लिया गया है। इनमें त्रिशूली-1 हाइड्रोपावर प्रोजैक्ट के 63 कर्मचारी और तमिलनाडु के 21 लोग शामिल हैं।
एकाएक 26 अगस्त की सुबह बाढ़, मलबा ऐसे आया, जिसका किसी को अंदाजा नहीं था क्योंकि इतनी भारी बारिश भी नहीं हुई थी कि लोग सतर्क हो संभल सकें। चीन के तिब्बती क्षेत्र से सटे इलाकों में अचानक आए भारी मात्रा में पानी, बर्फ, चट्टानों और रेत-कीचड़ का मलबा नेपाल की ओर बढ़ा जिसने एकाएक भोटेकोशी नदी का जलस्तर चंद मिनटों में ही बेहद खतरनाक स्तर तक पहुंचा दिया। इसी के चलते इसे जल प्रलय भी कह रहे हैं। लोग कुछ समझ पाते, उससे पहले सुबह 9 बजे नदी में अचानक तेज उफान आया। इसके बाद तिमुरे, रसुवागढ़ी, स्याफ्रूबेसी और आसपास के इलाकों में नदी के किनारे बने मकान, सड़क, पुल और दूसरे रोजमर्रा के उपयोग के निर्माण चपेट में आ गए। त्रासदी यह कि पानी केवल नदी की सामान्य बाढ़ की तरह नहीं बढ़ा, बल्कि अपने साथ भारी मात्रा में तलछट, बड़े पत्थर और मलबा भी नीचे ले आया।
इससे नुकसान केवल जलभराव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इमारतें और पुल-पुलिया भी बह गए। बेट्रावती से रसुवागढ़ी सीमा तक लगभग 42 किलोमीटर सड़क बाढ़ से बुरी तरह टूट-फूट गई और कंक्रीट के कई पुल भी बह गए। एकाएक आई बाढ़ की गति कितनी रही होगी, अंदाजा ही मुमकिन है क्योंकि त्रिशूली नदी पर गलछी में जलस्तर 30 मिनट में ही 9 मीटर तक बढ़ गया। मालखु में भी इसी दौरान करीब 7 मीटर की वृद्धि दर्ज की गई। यह वृद्धि सामान्य मानसूनी बाढ़ की तुलना में कहीं बहुत ज्यादा खतरनाक निकली। बाढ़ की लहर भोटेकोशी से आगे त्रिशूली नदी तंत्र में पहुंची। इससे रसुवा से नीचे की ओर नुवाकोट और धादिंग समेत कई इलाकों में नदी के किनारे बसे क्षेत्रों के लिए जोखिम बढ़ गया। कुछ जल निगरानी केंद्र भी बाढ़ के दौरान क्षतिग्रस्त हुए, जिससे वास्तविक समय में नदी की निगरानी का काम और भी कठिन हुआ।
स्थिति की भयावहता तब और बढ़ गई जब गुरुवार रात 9.18 बजे 3.2 तीव्रता का भूकंप आया, जिसका केंद्र 10 कि.मी. की गहराई पर था। इससे वहां बाढ़ का खतरा फिर मंडरा रहा है। इधर चीन ने बताया कि रसुवागढ़ी बॉर्डर से 18 कि.मी. ऊपर तिब्बत की ल्हेंदे नदी में एक नई बैरियर झील बन गई है जो लगभग 0.11 वर्ग कि.मी. में फैली है और करीब 200 करोड़ लीटर पानी जमा है जिसमें अगले 3 दिनों में 300 करोड़ लीटर और पानी आ सकता है। मतलब कि यह झील भी टूट सकती है। यदि ऐसा हुआ तो भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में फिर अचानक बाढ़ आ सकती है। अभी नेपाल की ओर के ढलानदार भूभागों की बस्तियां, सड़कें, पुल, जलविद्युत परियोजनाएं और अन्य बुनियादी ढांचे तबाही की जद में हैं। तिब्बत में हिमस्खलन होने या ग्लेशियर झीलों के फटने पर नेपाल की ओर के निचले तटीय क्षेत्रों में समय-समय पर क्षति होना आम घटना है।
जानकार भी मानते हैं कि बार-बार हो रहे हादसों के पीछे नेपाल-चीन सीमावर्ती हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक बनावट के साथ-साथ ग्लेशियल झीलों की स्थितियों में होने वाले बदलाव ही कारण हैं। नेपाल की ओर ढलानदार क्षेत्र हैं जिनमें तमाम बस्तियां बसी हुई हैं। इसके चलते इन झीलों के फटने और हिमस्खलन की हमेशा आशंका बस्तियों में बनी रहती है। चूंकि ऊपर तिब्बती क्षेत्र में कई हिमताल हैं, जिनमें विभिन्न कारणों और पर्यावरणीय असंतुलन से पिघलन होता रहता है और इसके रौद्र रूप लेते ही ऐसी घटनाएं घटती हैं।
नेपाल की बार-बार की तबाही का कारण इसका भूगोल भी है। नेपाल बेहद कम दूरी में उच्च हिमालय से लेकर अपेक्षाकृत समतल तराई के मैदानों तक ढलानों वाले क्षेत्र में फैला हुआ है, जिससे ऊपर हुई बारिश का असर नीचे पड़ता है। बस इसी का पहले से पता लगाने और सतर्क रहने से काफी त्रासदियां रोकी जा सकती हैं। अभी अर्ली वाॄनग सिस्टम यानी पूर्वसूचना प्रणाली भी लगी थी, जो खुद चपेट में आ गई वरना काफी हद तक मानवीय क्षति को काबू किया जा सकता था। भविष्य में जोखिम वाले इलाकों की पहले से ही पहचान कर आपदा की प्रतीक्षा से बेहतर नदी किनारे की बस्तियों को थोड़ी सी भी आहट में हटा कर जन और धन दोनों की क्षति कम की जा सकती है। सच तो यह कि आपदा संभावित क्षेत्रों में यदि बस्तियां ही नहीं बसें तो इससे बेहतर कुछ हो नहीं सकता।-ऋतुपर्ण दवे