पंजाब में वोटर सूचियों के ‘एस.आई.आर.’ का विरोध और वास्तविक तथ्य

Edited By Updated: 16 Oct, 2026 04:29 AM

opposition to sir of voter lists in punjab and the facts

पंजाब में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एस.आई.आर.) को लेकर राजनीतिक माहौल गर्माया हुआ है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी द्वारा मतदाताओं के नाम काटे जाने पर सवाल उठाए जा रहे हैं, जबकि भाजपा का तर्क है कि मतदाता सूचियों को सही और अपडेट रखना...

पंजाब में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एस.आई.आर.) को लेकर राजनीतिक माहौल गर्माया हुआ है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी द्वारा मतदाताओं के नाम काटे जाने पर सवाल उठाए जा रहे हैं, जबकि भाजपा का तर्क है कि मतदाता सूचियों को सही और अपडेट रखना निष्पक्ष चुनावों के लिए आवश्यक है। भारत निर्वाचन आयोग द्वारा पंजाब सहित विभिन्न राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू की गई। पंजाब में भी घर-घर जाकर मतदाताओं के ब्यौरे का सत्यापन करने की प्रक्रिया 25 जून से 3 अगस्त, 2026 तक चली। इसके बाद 13 अगस्त को ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी की गई। इस सूची में से लगभग 20,66,635 नाम घटे हुए सामने आए, जिससे राजनीतिक दलों में चिंता पैदा होना स्वाभाविक था। 

चुनाव अधिकारियों द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, पंजाब में पहले दर्ज मतदाताओं की संख्या लगभग 2.14 करोड़ थी। इनमें से 1,93,94,408 मतदाताओं के एन्यूमरेशन फॉर्म प्राप्त हुए, जो कुल मतदाताओं का 90.37 प्रतिशत बनते हैं। बाकी 20,66,635 नामों के बारे में दिए गए ब्यौरे के अनुसार 9,44,131 व्यक्ति स्थायी रूप से अन्य स्थानों पर चले गए थे, 5,74,568 मृतक दर्ज थे, 4,12,715 व्यक्ति अनुपस्थित या मिले नहीं और 1,19,145 डुप्लीकेट प्रविष्टियां थीं। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि वोट घटने के कई अलग-अलग कारण थे लेकिन विपक्षी दलों द्वारा इस तरह दर्शाया जा रहा था जैसे सभी 20,66,635 वोट गलत तरीके से हटाए गए हों।

कांग्रेस की आपत्ति है कि इस प्रक्रिया के दौरान किसी भी योग्य नागरिक का वोट नहीं काटा जाना चाहिए। पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वङ्क्षडग़ ने पार्टी के ब्लॉक स्तरीय प्रतिनिधियों को सूचियों की जांच करने के लिए कहा था। दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी के नेता बलतेज पन्नू ने भी सूचियों की जांच करने और नाम हटे होने की स्थिति में लोगों को पुन: पंजीकरण के लिए आवेदन करने के लिए कहा। अकाली दल के नेता दलजीत सिंह चीमा ने भी सूचियों की जांच करने और आपत्तियां दर्ज कराने की बात कही। इससे स्पष्ट है कि नामों का सत्यापन केवल एक पार्टी का नहीं, बल्कि सभी पाॢटयों और मतदाताओं के हित का मामला है।

भाजपा का पक्ष है कि सही मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है। मृत व्यक्तियों के नाम, डुप्लीकेट प्रविष्टियों और स्थायी रूप से पता बदल चुके लोगों के पुराने रिकॉर्ड की पहचान करना चुनाव प्रबंधन को बेहतर बनाने का हिस्सा है। लेकिन इसके साथ यह सुनिश्चित करना भी अनिवार्य है कि कोई योग्य मतदाता केवल दस्तावेजी गलती, पते के बदलाव या रिकॉर्ड में अंतर के कारण अपने अधिकार से वंचित न रह जाए। किसी पुराने रिकॉर्ड से नाम न मिलना अपने आप में किसी नागरिक की अयोग्यता का अंतिम प्रमाण नहीं हो सकता। इसीलिए ड्राफ्ट सूची जारी होने के बाद दावों और आपत्तियों के लिए 13 अगस्त से 12 सितम्बर तक का समय दिया गया था। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार लगभग 12.80 लाख मतदाताओं के रिकॉर्ड को 2003 की मतदाता सूची से मिलाया नहीं जा सका था। इन्हें सीधे तौर पर अयोग्य करार देने की बजाय सत्यापन के लिए नोटिस और दस्तावेजों की जांच की प्रक्रिया रखी गई। इसके बाद ऐसे मामलों का निपटारा करना चुनाव प्रशासन की जिम्मेदारी है।

23 सितम्बर को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार 22.69 लाख मतदाताओं के रिकॉर्ड में पाई गई ताॢकक गड़बडिय़ों में से 22.41 लाख, यानी 98.77 प्रतिशत मामलों का सत्यापन किया जा चुका था। यह आंकड़ा दर्शाता है कि जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ी लेकिन इससे हर व्यक्ति के वोट के बारे में अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। 12 अक्तूबर को छपी अंतिम सूची के अनुसार कटे हुए वोटों की संख्या 20,66,635 से घटकर 13,06,316 रह गई। इन कटे हुए वोटों में स्थायी रूप से राज्य छोड़ चुके मतदाता और वे मतदाता भी शामिल हैं, जिनका कुछ अता-पता नहीं। और नए वोट बनवाने के लिए हर नागरिक के पास समय है।

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को सवाल उठाने का पूरा अधिकार है लेकिन किसी भी पार्टी को बिना सबूत के लाखों वोट काटने या फर्जी मतदाताओं के दावे नहीं करने चाहिएं। उदाहरण के तौर पर कांग्रेस के प्रवक्ता हरदीप सिंह किंगरा ने एक चैनल को बताया कि वर्तमान मुख्य चुनाव अधिकारी के नेतृत्व में बहुत ही पारदर्शी तरीके से सारा काम किया गया है। लेकिन अब उनके द्वारा एस.आई.आर. को वोट चोरी करने का तरीका बताकर विरोध किया जा रहा है। हालांकि चुनाव आयोग की कार्रवाई की आलोचना को भी बिना जांच राजनीति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता लेकिन असली कसौटी यह है कि कितने नाम सही कारणों से हटाए गए, कितने योग्य मतदाताओं के नाम गलती से हटे और उन्हें कितनी जल्दी बहाल किया गया। पंजाब के हित में यही है कि मतदाता सूचियां पारदर्शी, सही और विश्वसनीय हों। फर्जी प्रविष्टियों की पहचान हो, लेकिन किसी असली मतदाता का लोकतांत्रिक अधिकार भी न छिने। राजनीतिक बहस का मकसद किसी पार्टी को जिताना या हराना नहीं होना चाहिए, बल्कि हर योग्य नागरिक के वोट की रक्षा करना होना चाहिए।-इकबाल सिंह चन्नी
 

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