Edited By ,Updated: 31 Jan, 2026 04:25 AM

भारत का मूलमंत्र, लोकतंत्र और समानता का आधार होते हुए भी व्यवस्था की कार्यप्रणाली सोचने को मजबूर करती है कि यही सत्य है या कोई भ्रम है। उदाहरण के लिए, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, जिसके पास भारत में उच्च शिक्षा की जिम्मेदारी है, इस तरह के नियम बनाए,...
भारत का मूलमंत्र, लोकतंत्र और समानता का आधार होते हुए भी व्यवस्था की कार्यप्रणाली सोचने को मजबूर करती है कि यही सत्य है या कोई भ्रम है। उदाहरण के लिए, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, जिसके पास भारत में उच्च शिक्षा की जिम्मेदारी है, इस तरह के नियम बनाए, जिन पर उच्चतम न्यायालय गौर न करे तो देश में युवाओं की स्थिति यह हो जाए कि आपस में बात करने या मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने में इसलिए हिचकिचाएं कि कहीं सरकारी नियमों की अवहेलना तो नहीं कर रहे। यह डर पैदा करता है और खतरनाक है।
भ्रम, असुरक्षा और दिशाहीनता : हो यह रहा है कि अस्पष्ट नियमों, बार-बार बदलते फैसलों और बिना सिर-पैर के सुधार करने की जिद ने विद्यार्थियों के भविष्य को संकट में डाल दिया है। वे डिग्री लें तो किस विषय में, क्या उसके अनुरूप नौकरी मिल पाएगी या स्वरोजगार कर पाएंगे और जो परिस्थिति आज है, क्या वह कल किसी आधे-अधूरे नियम के लागू होने से बदल तो नहीं जाएगी और यदि ऐसा हुआ तो उसका अब तक का किया-धरा व्यर्थ ही हो जाएगा।अजीब विरोधाभास है, एक ओर आरक्षित, जिसे पिछड़ा माना जाता है तथा जनरल कैटेगरी, जिसे तगड़ा या समर्थ कहा जाता है, के बीच द्वेष उत्पन्न करना और दूसरी ओर भारत का विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का रास्ता तय करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक समझौते करना। प्रश्न यह है कि क्या यह किन्हीं खास व्यक्तियों, उनके व्यापार और उद्योग समूहों के लाभ को ध्यान में रखकर तो नहीं किया जा रहा, क्योंकि जब युवाओं में एक-दूसरे के प्रति ऊंच-नीच का भाव होगा, तब ही यह संभव हो सकेगा।
व्यापारिक समझौते : जहां तक यूरोपीय तथा भारत के साथ व्यापार करने के इच्छुक दूसरे देशों की बात है, तो हकीकत यह है कि वे हमें केवल अपना सप्लायर बनाकर रखना चाहते हैं न कि बराबरी का रिश्ता यानी निर्णायक भूमिका अदा करने वाला। वे भारत को एक बड़े बाजार की तरह देखते हैं, जहां वे अपनी अनुपयोगी वस्तुओं, उपकरणों और पुरानी टैक्नोलॉजी को बेच कर मुनाफा कमा सकें और हमें सशक्त बनाने के भ्रम में रख सकें। ये सब चाहते हैं कि भारत में उत्पादन हो लेकिन दाम वे तय करें। सस्ता श्रम होने और हमें प्रशिक्षित करने के बहाने वे हमारी आत्मनिर्भर बनने की दिशा में रोड़े अटकाने का काम यह कहकर करते हैं कि वे अपने विशेषज्ञों और कर्मचारियों से यह सब करा तो रहे हैं, हमें क्यों इस पचड़े में पडऩा कि स्वयं गहन रिसर्च करें, अपनी टैक्नोलॉजी विकसित करें और दूसरी परेशानियां मोल लें। उनका लक्ष्य बाजार खुलवाना है, न कि बराबरी की हैसियत बनने देना। भारत जो समझौते इन देशों से कर रहा है, यदि सतर्कता नहीं बरती गई तो भारत उनके लिए एक माल गोदाम बन जाएगा।
अमरीका का रुख बदलते दिखना एक अवसर है कि भारत अपनी नीतियों और विशेषकर कूटनीति से उसे यह अहसास और अन्य देशों को विश्वास दिलाए कि हम ही बेहतर हैं। उद्योग हो या आधुनिक टैक्नोलॉजी, हम सभी स्तरों पर काम करना जानते हैं। इन सभी देशों की नीति है कि भारत को काम पर लगाए रखो, यह सोचने का अवसर न दो कि हम उनके लीडर बन सकते हैं। असली ताकत क्षमता है न कि समझौता। स्थायी लाभ की स्थिति यह है कि हमारे उत्पाद और कल-कारखाने स्वदेशी टैक्नोलॉजी से उत्पादन करें और अपनी गुणवत्ता का लोहा मनवाएं, इस स्थिति में ही वे हमें अपनी नवीनतम तकनीक देने को तैयार होंगे।
यह भी विचारणीय है कि कहीं ये देश इन समझौतों से हमें अपने लिए चीन का विकल्प बनाने की नीति पर तो नहीं चल रहे? सम्भव है कि ये पश्चिमी देशों के तरह-तरह के टैक्स, जैसे ग्रीन टैक्स, कार्बन टैक्स, खेतीबाड़ी और कृषि उत्पाद के लिए ऐसे सख्त स्टैण्डर्ड, जो हमारे लिए फायदेमंद न हों, यही नहीं, वीजा सीमा और टैक्नोलॉजी ट्रांसफर में आनाकानी, यह सब हम पर थोपने लगें। ये ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर जनता का जागरूक रहना आवश्यक है, वरना ये राजनीतिज्ञ अपनी वाहवाही के लिए कुछ भी कर सकते हैं।
यह खेल समझना होगा : संशय होता है कि यू.जी.सी. वैश्विक प्रभावों में तो आकर यह सब नहीं कर रहा कि हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी हो कि युवाओं को डिग्री तो मिले, लेकिन ग्लोबल स्किल नहीं। उनके यहां हमारे योग्य युवा शानदार वेतन और सुविधाओं वाली नौकरी तो करें लेकिन भारत में रहकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन न कर पाएं। सरकार युवाओं के लिए रुकावट बनकर अर्थहीन नियम लागू करती है, बेमतलब की पाबंदियां लगाती है, उद्यमी को नियमों का हवाला देकर वर्षों तक लटकाए रखती है, ताकि वह सोचने के लिए मजबूर हो कि विदेश में ही जाकर अपनी योग्यता के अनुसार उन्नति करे तो अच्छा होगा।
मतलब यह कि उच्च शिक्षा ऐसी हो, जो आॢथक रूप से सक्षम और निर्णय लेने की मानसिकता बना सके, न कि जाति के आधार पर भेदभाव करने की। सॢवस सैक्टर हो या औद्योगिक क्षेत्र, सरकारी सहयोग और वित्तीय संसाधन प्राप्त न हों तो कितना भी बुद्धिमान व्यक्ति हो, वह छोटी-मोटी प्रगति बेशक कर ले लेकिन वैश्विक स्तर पर अपनी और देश की पहचान नहीं बना सकता। युवा वर्ग को यह सब समझ कर ही अपना रास्ता तय करना होगा।-पूरन चंद सरीन