Edited By ,Updated: 06 Aug, 2026 04:17 AM

आज दुनिया की जनसंख्या तेजी से वृद्धावस्था की ओर बढ़ रही है। स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार और जीवन प्रत्याशा बढऩे के कारण बुजुर्गों की संख्या लगातार बढ़ रही है। भारत में भी 60 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों की संख्या करोड़ों में पहुंच चुकी है। ऐसे में...
आज दुनिया की जनसंख्या तेजी से वृद्धावस्था की ओर बढ़ रही है। स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार और जीवन प्रत्याशा बढऩे के कारण बुजुर्गों की संख्या लगातार बढ़ रही है। भारत में भी 60 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों की संख्या करोड़ों में पहुंच चुकी है। ऐसे में उनकी सुरक्षा, सम्मान और कल्याण सुनिश्चित करना समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है।वृद्धजन दुव्र्यवहार का अर्थ है बुजुर्गों के साथ किसी भी प्रकार का ऐसा व्यवहार, जो उनके सम्मान, स्वास्थ्य, सुरक्षा या अधिकारों को नुकसान पहुंचाए। यह दुव्र्यवहार शारीरिक ङ्क्षहसा, मानसिक प्रताडऩा, आर्थिक शोषण, उपेक्षा अथवा सामाजिक अलगाव के रूप में सामने आ सकता है।
कई बार बुजुर्गों को अपमानित किया जाता है, उनकी बातों को महत्व नहीं दिया जाता या उन्हें परिवार के निर्णयों से दूर रखा जाता है। कुछ मामलों में उनकी संपत्ति और धन का अनुचित लाभ उठाया जाता है। कई बुजुर्ग अकेलेपन, असुरक्षा और भावनात्मक उपेक्षा का शिकार भी होते हैं। यह सब उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालता है। संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न सामाजिक अध्ययनों के अनुसार, विश्वभर में बड़ी संख्या में बुजुर्ग किसी न किसी रूप में दुव्र्यवहार का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक आंकड़े काफी अधिक हो सकते हैं क्योंकि अधिकांश बुजुर्ग सामाजिक बदनामी, पारिवारिक दबाव या भय के कारण शिकायत दर्ज नहीं कराते।
भारत में संयुक्त परिवार व्यवस्था के कमजोर होने, शहरीकरण, व्यस्त जीवनशैली और सामाजिक मूल्यों में बदलाव के कारण कई बुजुर्ग अकेलेपन और उपेक्षा का सामना कर रहे हैं। आॢथक निर्भरता और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उनकी स्थिति को और कठिन बना देती हैं। वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या भी इस सामाजिक चुनौती की ओर संकेत करती है। बुजुर्ग किसी भी समाज की अमूल्य धरोहर होते हैं। उनके पास अनुभव, ज्ञान और जीवन के संघर्षों से प्राप्त सीख का विशाल भंडार होता है। परिवार में वे मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं तथा नई पीढ़ी को संस्कार, परंपराएं और जीवन मूल्य सिखाते हैं। आज जिन युवाओं और बच्चों को बेहतर शिक्षा, संस्कार और अवसर प्राप्त हैं, उसके पीछे कहीं न कहीं बुजुर्गों का त्याग, परिश्रम और योगदान जुड़ा हुआ है। इसलिए उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करना हमारा नैतिक कत्र्तव्य है। किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने वरिष्ठ नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है।
भारत सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और कल्याण के लिए अनेक कदम उठाए हैं। ‘माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007’ के अंतर्गत संतान पर अपने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल की जिम्मेदारी निर्धारित की गई है। इसके अलावा वरिष्ठ नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाओं, पैंशन योजनाओं और अन्य सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों का लाभ प्रदान किया जाता है। वृद्धजन दुव्र्यवहार की समस्या का समाधान केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए परिवार, समाज और प्रत्येक नागरिक को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। युवाओं को चाहिए कि वे अपने माता-पिता और दादा-दादी के साथ समय बिताएं, उनकी भावनाओं का सम्मान करें और उनकी आवश्यकताओं को समझें। विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान और अधिकारों से संबंधित जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिएं। सामाजिक संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं को बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य शिविर, मनोरंजन कार्यक्रम और सहायता सेवाएं संचालित करनी चाहिएं। समाज में ऐसा वातावरण बनाना आवश्यक है, जहां बुजुर्ग स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और उपयोगी महसूस करें।
बुजुर्गों को केवल आॢथक सहायता ही नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान और अपनापन भी चाहिए। उनके साथ कुछ समय बिताना, उनकी बातें सुनना और उन्हें परिवार का महत्वपूर्ण सदस्य मानना उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। कई बार छोटी-सी संवेदनशीलता भी उनके अकेलेपन और निराशा को दूर कर सकती है। बुजुर्ग बोझ नहीं, बल्कि समाज की अमूल्य संपत्ति हैं। उनके अनुभव और मार्गदर्शन से समाज मजबूत बनता है। इसलिए उनके अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें सम्मानपूर्ण जीवन प्रदान करना हम सभी की सांझी जिम्मेदारी है। आइए संकल्प लें कि अपने घर और समाज के प्रत्येक बुजुर्ग को सम्मान, सुरक्षा और स्नेह प्रदान करेंगे। उनके अनुभवों का आदर करेंगे, उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखेंगे और ऐसा समाज बनाएंगे, जहां हर वरिष्ठ नागरिक गरिमा, आत्मसम्मान और खुशहाली के साथ जीवन जी सके।-प्रो. मनोज डोगरा