लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण और वह सम्मान के पात्र

Edited By Updated: 17 Mar, 2026 05:47 AM

the role of the lok sabha speaker is significant and they are worthy of respect

संसदीय स्थिरता और स्वतंत्रता को बढ़ावा देने में लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है और यह सम्मान का पात्र है। 11 मार्च, 2026 को, अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष का महाभियोग प्रस्ताव ध्वनि मत से पराजित हो गया, जो पिछले प्रयास के लगभग 4 दशक...

संसदीय स्थिरता और स्वतंत्रता को बढ़ावा देने में लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है और यह सम्मान का पात्र है। 11 मार्च, 2026 को, अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष का महाभियोग प्रस्ताव ध्वनि मत से पराजित हो गया, जो पिछले प्रयास के लगभग 4 दशक बाद किया गया था। 119 सांसदों द्वारा नोटिस पर हस्ताक्षर किए जाने के साथ, विपक्ष ने अध्यक्ष के आचरण में कथित पक्षपात को उजागर किया। 543 सदस्यीय सदन में अध्यक्ष को हटाने के लिए कम से कम 272 वोटों की आवश्यकता होती है और ऐतिहासिक रूप से, आज तक किसी भी अध्यक्ष को हटाया नहीं गया है। 

अध्यक्षों को दी जाने वाली बार-बार की चुनौतियां विधायिका में राजनीतिक तनाव को रेखांकित करती हैं, जो सत्ता संतुलन और कानून निर्माताओं के बीच आपसी सम्मान पर सवाल उठाती हैं। इस प्रकार, अध्यक्ष की भूमिका विधायी प्रक्रियाओं और संसदीय लोकतंत्र में विश्वास बढ़ाने, दोनों के लिए अनिवार्य है। असफल महाभियोग प्रस्ताव के बाद, अध्यक्ष बिरला ने अपनी निष्पक्षता दोहराई और जोर देकर कहा कि नियम प्रधानमंत्री सहित सभी सदस्यों पर समान रूप से लागू होते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अध्यक्ष के माइक्रोफोन को म्यूट करने का कोई तंत्र नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा, ‘‘यह सदन कोई मेला या उत्सव नहीं है। हमें नियमों का पालन करना चाहिए और किसी को भी उनके बाहर बोलने का अधिकार नहीं है, चाहे उनका पद कुछ भी हो।’’

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में विपक्ष के अनियंत्रित प्रदर्शन की आलोचना की और राहुल गांधी की कम उपस्थिति पर प्रकाश डाला, जो कि 17वीं लोकसभा में 51 प्रतिशत और 16वीं लोकसभा में 52 प्रतिशत थी, जबकि औसत क्रमश: 66 प्रतिशत और 80 प्रतिशत रहा है। विपक्ष ने ‘माफी मांगो’ के नारे लगाकर विरोध प्रदर्शन किया और गृह मंत्री से माफी की मांग की। महाभियोग प्रस्ताव ने सत्ताधारी दल के भारी बहुमत को रेखांकित और संसदीय प्रक्रियाओं के महत्व को सुदृढ़ किया। इसने उस सम्मान पर प्रकाश डाला, जो सदन अपनी विधायी प्रक्रियाओं के लिए चाहता है। भारत के संसदीय इतिहास में महाभियोग प्रस्ताव दुर्लभ घटनाएं हैं। अध्यक्ष बिरला को हटाने का प्रयास ऐसा चौथा प्रयास है, जो इस महत्वपूर्ण पद की अंतॢनहित चुनौतियों को रेखांकित करता है। अध्यक्ष का पद राष्ट्रपति की बजाय स्वयं सदन द्वारा सुरक्षित होता है और निष्कासन केवल बहुमत के वोट से ही हो सकता है। यह कार्यालय की स्वतंत्रता और संसदीय स्थिरता बनाए रखने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है। पिछले प्रयासों में, 1954 में पहले अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के खिलाफ प्रस्ताव और बिरला के खिलाफ हालिया प्रस्ताव शामिल हैं। ये घटनाएं पक्षपात और संसदीय आचरण के संबंध में चल रही चिंताओं को उजागर करती हैं।

स्वतंत्रता के बाद से, लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के 3 असफल प्रयास हुए हैं। पहला 1954 में पहले अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के खिलाफ था। प्रस्ताव पर 18 दिसम्बर को चर्चा हुई, जिसमें प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और विपक्ष के नेता ए.के. गोपालन ने भाग लिया। सांसदों ने मावलंकर पर प्रासंगिक प्रश्नों को अस्वीकार करने और स्थगन नोटिसों को गलत तरीके से संभालने का आरोप लगाया था। 1966 में, सांसदों ने सरदार हुकम सिंह पर उन जांचों में बाधा डालने का आरोप लगाया, जो सरकार को शॄमदा कर सकती थीं और विशेषाधिकार नोटिस प्रस्तुत करने में विफल रहने का आरोप लगाया। प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका, क्योंकि 50 से कम सांसदों ने इसका समर्थन किया था। सी.पी.एम. (माकपा) सांसद सोमनाथ चटर्जी ने अध्यक्ष बलराम जाखड़ के खिलाफ एक प्रस्ताव पेश किया था। प्रमुख प्रतिभागियों में प्रधानमंत्री राजीव गांधी और पी. चिदम्बरम शामिल थे। सदन ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। राज्यसभा में, 2024 में उपराष्ट्रपति और सभापति जगदीप धनखड़ को हटाने के प्रयास विफल रहे हैं। इसी तरह, 2020 में उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह को हटाने के नोटिसों पर बहस नहीं हो सकी।

‘प्रभावी बहुमत’ की आवश्यकता, जिसे सदन के सभी मौजूदा सदस्यों के बहुमत के रूप में परिभाषित किया गया है, अध्यक्ष को हटाने की सीमा निर्धारित करती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि एक महत्वपूर्ण आम सहमति आवश्यक है। महाभियोग बहस के दौरान, विपक्षी नेताओं ने उपाध्यक्ष का पद रिक्त होने, दोषपूर्ण माइक्रोफोन, विपक्षी सदस्यों के लिए सीमित बोलने के अधिकार और सामूहिक निलंबन के बारे में ङ्क्षचताएं उठाईं। ये मुद्दे संसदीय संस्थानों और अध्यक्ष के कार्यालय के सामने आने वाली चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी की आलोचना करते हुए कहा कि वह संसदीय सत्रों में शामिल होने की बजाय पार्टी के उद्देश्यों और प्रचार के लिए यात्रा करते हैं। शाह ने कहा, ‘‘उन्होंने राष्ट्रपति के भाषण, बजट और अनुच्छेद 370 पर चर्चा को छोड़ दिया। प्रमुख संसदीय सत्रों के दौरान, वह विदेश यात्रा करते हैं और दावा करते हैं कि उन्हें बोलने की अनुमति नहीं है।’’

उन्होंने आगे कहा, ‘‘इस सदन के स्थापित इतिहास के अनुसार, इसकी कार्रवाई आपसी विश्वास के आधार पर संचालित होती है। अध्यक्ष एक तटस्थ संरक्षक के रूप में कार्य करता है, जो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों का प्रतिनिधित्व करता है। संसदीय राजनीति के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण था कि अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव पेश किया गया।’’ अध्यक्ष का अधिकार उनकी निष्पक्षता के महत्व और महाभियोग बहस जैसे विवादास्पद क्षणों के दौरान आने वाली चुनौतियों को रेखांकित करता है, जिससे दर्शकों को संसदीय स्थिरता के लिए इस पद के महत्व को समझने में मदद मिलती है। महाभियोग के अंत में, मोदी ने लोकसभा की कार्रवाई ‘समर्पण, धैर्य और निष्पक्षता’ के साथ संचालित करने के लिए ओम बिरला की सराहना की। अब जबकि सदन ने महाभियोग प्रस्ताव को हरा दिया है, भले ही लोकसभा भंग हो जाए, अध्यक्ष ओम बिरला तब तक अपने पद पर बने रहेंगे जब तक कि नई सदन की बैठक नहीं होती और नया अध्यक्ष नहीं चुन लिया जाता।-कल्याणी शंकर
 

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