Edited By jyoti choudhary,Updated: 03 Jul, 2026 12:05 PM

ऑनलाइन शॉपिंग का चलन लगातार बढ़ रहा है और इसके साथ ही रिफंड से जुड़े विवाद भी सामने आते रहते हैं। ऐसे मामलों में आंध्र प्रदेश के जिला उपभोक्ता आयोग ने उपभोक्ताओं के हित में एक अहम फैसला सुनाया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी
बिजनेस डेस्कः ऑनलाइन शॉपिंग का चलन लगातार बढ़ रहा है और इसके साथ ही रिफंड से जुड़े विवाद भी सामने आते रहते हैं। ऐसे मामलों में आंध्र प्रदेश के जिला उपभोक्ता आयोग ने उपभोक्ताओं के हित में एक अहम फैसला सुनाया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी उत्पाद का रिफंड निर्माता (मैन्युफैक्चरर) ई-कॉमर्स कंपनी को भेज चुका है, तो वह राशि ग्राहक तक पहुंचाना कंपनी की जिम्मेदारी है। रिफंड रोककर रखना सेवा में कमी और अनुचित व्यापारिक व्यवहार माना जाएगा।
इसी मामले में आयोग ने खराब ईयरबड्स के रिफंड में देरी और शिकायत का उचित समाधान नहीं करने पर Amazon Retail India Pvt. Ltd. को ग्राहक को 5,199 रुपए लौटाने के साथ 5,000 रुपए का मुआवजा और 5,000 रुपए मुकदमे के खर्च के रूप में देने का आदेश दिया है।
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क्या है पूरा मामला?
आंध्र प्रदेश के विजयनगरम निवासी विवेकानंद ने 18 जनवरी 2024 को अमेजन से 5,199 रुपए के ईयरबड्स खरीदे थे। कुछ समय बाद डिवाइस में ब्लूटूथ कनेक्टिविटी की समस्या आने लगी। शिकायत मिलने पर निर्माता ने पहले वारंटी के तहत नया ईयरबड्स देने का आश्वासन दिया लेकिन बाद में उसे बदलने के बजाय पूरी खरीद राशि लौटाने का फैसला किया।
निर्माता ने रिफंड की रकम अमेजन को भेज दी ताकि वह ग्राहक के खाते में ट्रांसफर की जा सके। हालांकि, कई बार आश्वासन मिलने के बावजूद ग्राहक को पैसे वापस नहीं मिले।
अमेजन को ठहराया जिम्मेदार
ग्राहक ने कई बार ईमेल, फोन कॉल और कानूनी नोटिस के जरिए रिफंड की मांग की लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ। सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि रिफंड की राशि पहले ही अमेजन को मिल चुकी थी, फिर भी उसे ग्राहक के खाते में ट्रांसफर नहीं किया गया। आयोग ने इसे सेवा में कमी माना और कंपनी को 45 दिनों के भीतर 5,199 रुपए का रिफंड, 5,000 रुपए मुआवजा और 5,000 रुपए मुकदमे के खर्च के रूप में भुगतान करने का निर्देश दिया।
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उपभोक्ताओं के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
यह फैसला ऑनलाइन खरीदारी करने वाले ग्राहकों के अधिकारों को मजबूत करता है। आयोग ने साफ किया है कि रिफंड में अनावश्यक देरी या राशि रोककर रखना स्वीकार्य नहीं है। यदि किसी ग्राहक को रिफंड के लिए बार-बार कंपनी के चक्कर लगाने पड़ते हैं, तो वह न केवल अपनी रकम वापस पाने बल्कि मानसिक परेशानी और कानूनी खर्च के लिए भी मुआवजे का दावा कर सकता है।