भारत की मजबूत आर्थिक बुनियाद तेल संकट के प्रभाव को कम करने में होगी मददगार: एसएंडपी

Edited By Updated: 14 Apr, 2026 06:45 PM

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भारत की मजबूत वृहद आर्थिक और वित्तीय बुनियाद कच्चे तेल की कीमतों में लगातार होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रभाव को कम करने में मददगार हो सकती है। हालांकि, अगर 2026 में कच्चे तेल की औसत कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो आर्थिक वृद्धि दर में 0.80...

बिजनेस डेस्कः भारत की मजबूत वृहद आर्थिक और वित्तीय बुनियाद कच्चे तेल की कीमतों में लगातार होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रभाव को कम करने में मददगार हो सकती है। हालांकि, अगर 2026 में कच्चे तेल की औसत कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो आर्थिक वृद्धि दर में 0.80 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। 

इस परिदृश्य के तहत, वित्त वर्ष 2026-27 में कंपनियों की ब्याज, कर, मूल्यह्रास और ट्रेडमार्क, पेंटेंट तथा अन्य संपत्ति की समय बढ़ने के साथ लागत में कमी के आकलन से पहले की आय (ईबीआईटीडीए) में 15-25 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। इससे कर्ज में 0.5 गुना से एक गुना तक बढ़ने का अनुमान है। वहीं बैंकिंग क्षेत्र की परिसंपत्ति की गुणवत्ता कमजोर हो सकती है, जिससे एनपीए (गैर-निष्पादित परिसंपत्ति) लगभग 3.5 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। 

आर्थिक गतिविधियां होंगी प्रभावित 

एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने एक रिपोर्ट में कहा, ''पश्चिम एशिया में युद्ध से उत्पन्न झटकों से भारत अछूता नहीं है। ऊर्जा की ऊंची कीमतों और आपूर्ति में रुकावट की समस्या कई महीनों तक बनी रह सकती है, जिससे सभी क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होंगी।'' हालांकि, कंपनियों का मजबूत बही-खाता, बैंकों में अच्छी पूंजी और मजबूत बाह्य स्थिति इस प्रभाव से बचाव प्रदान करेंगे। 

एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने तनावपूर्ण स्थिति में ब्रेंट क्रूड की कीमत 2026 में 130 डॉलर और 2027 में 100 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान लगाया है, जबकि तुलनात्मक आधार पर यह कीमत क्रमशः 85 डॉलर और 70 डॉलर है। एजेंसी को भारत की रेटिंग पर तत्काल किसी प्रभाव की उम्मीद नहीं है। 

तेल की ऊंची कीमतों से बढ़ सकता है चालू खाता घाटा 

हालांकि, राजकोषीय मोर्चे पर मजबूत प्रयासों को अस्थायी रूप से झटका लग सकता है। तेल की ऊंची कीमतों से चालू खाते घाटा बढ़ सकता है। अनुमान के अनुसार, 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से यह घाटा जीडीपी के लगभग 0.4 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। जोखिम से बचने की धारणा और बढ़ते आयात बिल के कारण रुपए की विनिमय दर का दबाव भी पड़ सकता है।

एजेंसी ने चेतावनी दी है कि ऊर्जा संकट का असर कच्चे माल की ऊंची लागत, घटते कॉरपोरेट मार्जिन, बढ़ती उपभोक्ता कीमतों और यदि सरकार सब्सिडी के मामले में हस्तक्षेप करती है तो बढ़ते राजकोषीय दबाव के रूप में सामने आएगा। ईंधन और पेट्रोरसायन को प्रभावित करने वाली संभावित आपूर्ति बाधाओं से भी वृद्धि प्रभावित हो सकती है। इन जोखिमों के बावजूद, भारत की अर्थव्यवस्था ने 2026 में मजबूत वृद्धि, अच्छी घरेलू मांग और कम मुद्रास्फीति के साथ कदम रखा है। इससे निकट भविष्य में आने वाले झटकों को झेलने में मदद मिलनी चाहिए।
 

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