Edited By Niyati Bhandari,Updated: 14 Apr, 2026 09:09 AM

Ambedkar Jayanti 2026: डॉ. भीमराव अम्बेडकर जयंती 2026 पर विशेष लेख। जानें क्यों बाबा साहिब ने चीन और पाकिस्तान को लेकर सरकार को आगाह किया था और संविधान निर्माण में उनकी क्या भूमिका थी।
Ambedkar Jayanti 2026: 14 अप्रैल, 1891 को सूबेदार राम जी और माता भीमा बाई के घर जन्मे डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर केवल एक संविधान निर्माता ही नहीं, बल्कि 'ज्ञान के सागर' और विश्व के उन 6 महानतम विद्वानों में से एक थे, जिन्होंने मानवता को नई दिशा दी। आज उनकी जयंती के अवसर पर, हम बाबा साहिब के जीवन के उन पहलुओं को उजागर कर रहे हैं, जो आज के समय में और भी प्रासंगिक हो गए हैं।

ऊंच-नीच के विरुद्ध जीवनभर संघर्ष बाबा साहिब एक ऐसे महानायक थे। जिन्होंने बचपन से लेकर अपने अंतिम समय तक समाज में व्याप्त भेदभाव और ऊंच-नीच के विरुद्ध युद्ध लड़ा। उन्होंने तथागत बुद्ध और गुरु नानक देव जी के आदर्शों को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान की रचना की। दिलचस्प बात यह है कि संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी में 7 सदस्य थे, लेकिन बाबा साहिब के अलावा अन्य सदस्यों ने इसमें कोई विशेष रुचि नहीं दिखाई, जिसके कारण संविधान निर्माण का पूरा उत्तरदायित्व उन्हीं के कंधों पर आ गया था।
सिर्फ नेता नहीं, एक महान अर्थशास्त्री और विजनरी भी बाबा साहिब ने केवल सामाजिक न्याय की बात नहीं की, बल्कि राष्ट्र के आर्थिक विकास का खाका भी खींचा। उन्होंने कृषि को लाभदायक बनाने के लिए नदियों को जोड़ने और डैम बनाकर बिजली पैदा करने पर जोर दिया। आपको जानकर हैरानी होगी कि स्वतंत्रता से पूर्व ही उन्होंने अंग्रेजों को प्रेरित कर 8 बड़े डैम बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

चीन और पाकिस्तान पर बाबा साहिब की सटीक चेतावनी बाबा साहिब की दूरदर्शिता का प्रमाण उनकी भविष्यवाणियों में मिलता है। उन्होंने 1940 में ही अपनी पुस्तक 'थॉट्स ऑन पाकिस्तान' के जरिए आगाह कर दिया था कि पाकिस्तान एक अलग देश बनेगा और आबादी का तबादला समय रहते कर लेना चाहिए। इतना ही नहीं, उन्होंने नेहरू सरकार की चीन के साथ बढ़ती नजदीकियों पर भी कड़े सवाल उठाए थे। उनकी चेतावनी को नजरअंदाज करने का नतीजा भारत को चीन द्वारा अपनी भूमि खोकर भुगतना पड़ा।
आज के समय की मांग: बाबा साहिब के विचार बाबा साहिब का संदेश स्पष्ट था, "देश हर व्यक्ति, संस्था और धर्म से ऊपर है"।
उनका मानना था कि यदि विचारों का व्यवहारिक प्रचार नहीं होता, तो वे समय के साथ मर जाते हैं। आज देश को मजबूत बनाने के लिए इस महान अर्थशास्त्री और विद्वान के पदचिन्हों पर चलना अत्यंत आवश्यक है।
