क्या आज भी देवताओं से बात करना संभव है? जानिए यज्ञ के उस प्राचीन विज्ञान को, जो अव्यक्त को व्यक्त कर देता है

Edited By Updated: 04 Jan, 2026 11:28 AM

ancient science of yagya

आपने देवी-देवताओं के मनुष्यों के सामने प्रकट होने, उनसे बातचीत करने, उनके प्रश्नों के उत्तर देने और उन्हें वरदान देने की कहानियां पढ़ी और सुनी होंगी।

Ancient Science of Yagya : आपने देवी-देवताओं के मनुष्यों के सामने प्रकट होने, उनसे बातचीत करने, उनके प्रश्नों के उत्तर देने और उन्हें वरदान देने की कहानियां पढ़ी और सुनी होंगी। ये मात्र कहानियां नहीं हैं। आज के इस युग में भी, ध्यान आश्रम के साधक दिव्य सत्ताओं से संवाद करते हैं और उन्हें अपनी आंखों के सामने प्रकट होते हुए देखते हैं। मंत्र, ध्यान और यज्ञ वैदिक ज्ञान के उस खजाने के कुछ ऐसे उपकरण हैं जिनका उपयोग उन ऊर्जाओं के साथ संवाद करने के लिए किया जा सकता है जो इस सृष्टि को चलाती हैं। इस लेख में हम यज्ञ के प्राचीन विज्ञान और दिव्यता को प्रकट करने की इसकी क्षमता पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

व्यक्त और अव्यक्त के बीच की दूरी को मिटाना
ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है, यह केवल रूप बदलती है। यह न केवल भौतिक विज्ञान का एक मूलभूत नियम है, बल्कि इस सृष्टि का आधार भी है। हम अपने चारों ओर जो कुछ भी देखते हैं वह इसी ऊर्जा का एक रूप है, जिसे वैदिक ऋषियों ने 'प्राण' कहा है, जिसकी एक विशिष्ट आवृत्ति (frequency) होती है। जो आवृत्तियां आपकी सीमा (range) में होती हैं, वे आपको अनुभव होती हैं; जो उससे नीचे या ऊपर होती हैं, उन्हें आप अनुभव नहीं कर पाते, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनका अस्तित्व नहीं है। भौतिक आयाम की आवृत्तियां ब्रह्मांड की अंतहीन आवृत्तियों के विस्तार का एक बहुत छोटा हिस्सा मात्र हैं। सृष्टि में विभिन्न आयाम मौजूद हैं- व्यक्त, अर्ध-व्यक्त और अव्यक्त। यह आपकी संवेदनशीलता और चेतना का स्तर ही है जो यह निर्धारित करता है कि आप किस आयाम तक पहुंच सकते हैं। वैदिक ऋषियों ने अर्ध-व्यक्त आयाम, या 'देवलोक' जो भौतिकता से परे है, तक पहुंचने के लिए एक सरल साधन दिया- यज्ञ।

प्रथम यज्ञ
यज्ञ का विज्ञान उतना ही पुराना है जितनी यह सृष्टि। ब्रह्मा जी ने प्रथम यज्ञ किया था। जब उन्होंने यज्ञ किया, तो उन्होंने अपने स्वयं के एक अंश का त्याग किया। उनके इसी त्याग (आहुति) से 33 कोटि देवी-देवता प्रकट हुए, जिन्होंने सृष्टि के विभिन्न पहलुओं का कार्यभार संभाला। ब्रह्मा 'प्रजापति' (सृजनकर्ता) बने, जो भौतिक रचना के लिए उत्तरदायी हैं। श्री विष्णु ने 'पालक' की भूमिका निभाई, जो सृष्टि का संचालन करते हैं। भगवान शिव स्रोत (source) की ओर वापसी की यात्रा के लिए उत्तरदायी हुए।

त्याग का विज्ञान
'यज्ञ' शब्द का अर्थ है 'त्याग' या 'बलिदान'। यज्ञ का मूल अर्थ है, जो आपको प्रिय है उसका त्याग करना। सृष्टि किसी न किसी के त्याग पर चलती है, जैसे खाद्य श्रृंखला (food chain) में एक जीव दूसरे के लिए स्वयं को अर्पित करता है। त्याग जितना बड़ा होगा, उपलब्धि उतनी ही अधिक होगी।

प्रत्येक यज्ञ में एक 'हवि' (आहुति) होती है, जिसे अर्पित या वापस दिया जाता है। और यह त्याग किसी और का या किसी पशु का नहीं होता; यह त्याग स्वयं का या स्वयं के किसी पहलू का होता है। किसी पशु को कष्ट देकर दी गई बलि से पुण्य नहीं मिलता, बल्कि केवल नर्क की प्राप्ति होती है।

ब्रह्मा जी ने अपने अंश का त्याग किया। रावण ने भी दस बार अपने शीश अर्पित किए और तभी उसे शिव दर्शन प्राप्त हुए। पौराणिक ग्रंथ ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं जहां मनुष्यों, देवों और असुरों ने यज्ञ किए, और उन सभी यज्ञों में उन्होंने अपने अहंकार या अपनी इच्छाओं का त्याग किया।

यज्ञों के विभिन्न प्रकार
वैदिक काल में यज्ञ एक नियमित अभ्यास था। इन्हें कर्मकांड के रूप में नहीं, बल्कि अग्नि के माध्यम से सृष्टि की शक्तियों का आह्वान करने और उन्हें दिशा देने के एक सटीक विज्ञान के रूप में समझा जाना चाहिए।
वैदिक शास्त्रों में विभिन्न उद्देश्यों के लिए लगभग 400 प्रकार के यज्ञों का वर्णन है।
काम्य-कर्म: इच्छाओं की पूर्ति के लिए किए जाने वाले यज्ञ।
नित्य-कर्म: वे जो प्रत्येक व्यक्ति द्वारा कर्तव्य के रूप में किए जाने चाहिए।
गृह्य-कर्म (स्मार्त-कर्म): व्यक्ति और उसके परिवार से संबंधित यज्ञ, जो स्मृतियों के अंतर्गत आते हैं।
श्रौत-कर्म: वे यज्ञ जो संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए किए जाते हैं, इनका विस्तृत वर्णन श्रुतियों (वेदों) में है।

यज्ञ में सटीकता
विभिन्न उद्देश्यों के लिए यज्ञ कुंडों के आकार और माप के विशिष्ट नियम हैं। किस समय (मुहूर्त) और किस दिशा में यज्ञ किया जा रहा है, इसका भी विशेष महत्व है। यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली सामग्री (समिधा और सामग्री) भी यज्ञ के प्रकार के अनुसार भिन्न होती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मंत्र एक 'सिद्ध गुरु' द्वारा साधक को दिए जाने चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि दी गई आहुतियां उस देवता तक पहुँचें जिनका आह्वान किया गया है और वे यज्ञ की अग्नि में प्रकट हो सकें।

यज्ञ के लिए अनिवार्य तत्व
ऋग्वेद का पहला शब्द 'अग्नि' है। यज्ञ में अग्नि का उपयोग दिव्य शक्तियों के साथ संवाद करने के माध्यम के रूप में किया जाता है। अग्नि एक ऐसा तत्व है जो कभी प्रदूषित नहीं हो सकता और जो कुछ भी अग्नि में जाता है, वह भी शुद्ध हो जाता है। यज्ञ में अग्नि के इसी गुण का उपयोग किया जाता है। प्राचीन काल में वातावरण को शुद्ध करने के लिए हवन किए जाते थे; सामग्री और समिधा का उपयोग वातावरण में सकारात्मक स्पंदन छोड़ने और विषाक्तता व नकारात्मकता (स्वयं के भीतर और पर्यावरण दोनों की) को दूर करने के लिए किया जाता था।

हालांकि, यज्ञ के सफल होने के लिए यह आवश्यक है कि उपयोग की जाने वाली सामग्री, समिधा और घृत (गाय का घी) शुद्ध और मिलावट रहित हों। यज्ञ में भाग लेने वालों का भाव शुद्ध होना चाहिए। मंत्रों का उच्चारण त्रुटिहीन होना चाहिए। जब ये सभी तत्व गुरु के प्रति समर्पण के साथ मिलते हैं, तब अग्नि को दी गई आहुतियां अपने शुद्धतम रूप में सही आयामों तक पहुंचती हैं, जिससे वांछित परिवर्तन (transformation) घटित होता है।

यज्ञ की सफलता के संकेत
गुरु के सान्निध्य में, शुद्ध विचार, शुद्ध सामग्री और सही मंत्रोच्चार के साथ किए गए यज्ञ का प्रभाव पर्यावरण को पूरी तरह बदल देता है। मौसम बदल जाता है, हवा सुगंधित हो जाती है, पक्षी आसपास के पेड़ों पर आकर बैठने लगते हैं, भीतर और बाहर शांति और स्थिरता छा जाती है और बीमारियां दूर होने लगती हैं। ये सभी नकारात्मकता के दूर होने और सृष्टि में सकारात्मक शक्तियों के प्रकट होने के संकेत हैं।

अश्विनी गुरुजी 

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ

Related Story

Trending Topics

IPL
Royal Challengers Bengaluru

190/9

20.0

Punjab Kings

184/7

20.0

Royal Challengers Bengaluru win by 6 runs

RR 9.50
img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!