Basukinath Dham : शिव भक्तों की आस्था का दिव्य केन्द्र है वासुकिनाथ धाम, जहां हर कदम पर मिलता है शिव का आशीर्वाद

Edited By Updated: 25 Apr, 2026 03:19 PM

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वास्तुकिनाथ देवाधिदेव शिव के उपासकों की पावन तीर्थभूमि है। यहां पहुंचकर श्रद्धालु वासुकिनाथ के नाम से भगवान शिव की पूजा-अर्चना कर असीम पुण्य के भागी बनते हैं। झारखंड के वैद्यनाथ धाम से 28 मील पूर्व की ओर देवघर से दुमका जाने वाली पक्की सड़क पर...

Basukinath Dham : वास्तुकिनाथ देवाधिदेव शिव के उपासकों की पावन तीर्थभूमि है। यहां पहुंचकर श्रद्धालु वासुकिनाथ के नाम से भगवान शिव की पूजा-अर्चना कर असीम पुण्य के भागी बनते हैं। झारखंड के वैद्यनाथ धाम से 28 मील पूर्व की ओर देवघर से दुमका जाने वाली पक्की सड़क पर वासुकिनाथ है। देवघर और दुमका से मोटर-बस मिलती है। भागलपुर से भी बस आती है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में नागेश्वर ज्योतिर्लिंग कहां है- यह विवादग्रस्त प्रश्न है। द्वारका के पास, हैदराबाद राज्य में और यहां भी उसे बताया जाता है। दारुक वन में नागेश्वरलिंग का वर्णन है। दारुक का ही अपभ्रंश दुमका हो गया है, ऐसा विद्वान मानते हैं। वासुकिनाथ ही नागेश्वर ज्योतिर्लिंग है, इस प्रकार की ढृढ़ मान्यता विद्वानों की है।

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यहां पर वासुकिनाथ के मु य मंदिर के अतिरिक्त आस-पास पार्वती, काली, अन्नपूर्णा, राधाकृष्ण, तारा, त्रिपुरसुन्दरी, भैरवी, धूमावती, मातंगी, कार्तिकेय, गणेश, सूर्य, छिन्नमस्ता, बगला, त्रिपुरभैरवी, कमला, वटुकभैरव, कालभैरव, हनुमान तथा सुदर्शन चक्र के श्रीविग्रह हैं। मंदिर के घेरे में चंद्रकूप सरोवर है। उसी का जल शंकर जी पर चढ़ाया जाता है। मंदिर के उत्तर में शिव गंगा सरोवर है। सरोवर के पास हनुमान जी का मंदिर है। उससे कुछ पूर्व श्मशान घाट के पास तारादेवी का पीठ है। श्रावण, भाद्र, माघ तथा वैशाख में विशेष मेले लगते हैं।

कथा
इस स्थान से जुड़ी एक कथा पुराण-प्रयात है कि सुप्रिय नामक वैश्य शिवभक्त को आराधना करते समय दारुक नामक राक्षस मारने आया। तब भगवान शंकर ने प्रकट होकर उसका विनाश किया और भक्त की रक्षा की। भक्त की प्रार्थना पर भगवान यहीं ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थित हुए। कालांतर में वह ज्योतिर्लिंग लोक में प्रयात नहीं रहा। घोर वन में लुप्त हो गया। एक समय अकाल पड़ा। अकाल के कारण लोग वनों में कंद-मूल की खोज में भटकने लगे।

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वासु नामक एक मनुष्य कंद की खोज में भूमि खोद रहा था। उसके औजार का आघात ज्योतिॄलग पर लगा, तो उससे रक्त निकलने लगा। वासु डर गया, किंतु भगवान शंकर ने उसे आकाशवाणी द्वारा आश्वासन दिया।  वासु उसी समय उस क्षलग मूर्ति का पूजन करने लगा। वासु द्वारा पूजित होने से नागेश्वरलिंग का नाम वासुकिनाथ हो गया। वासुकिनाथ से ईशान कोण पर वासुकि पर्वत है। उस पर अमृत मंथन के बाद देवताओं ने वासुकि नाग को छोड़ा। उस वासुकि नाग द्वारा आराधित होने का कारण यह मूर्ति नागेश्वर तथा वासुकिनाथ इन दोनों नामों से प्र यात हुई, यह भी कुछ विद्वानों का मत है।

आस-पास के तीर्थ
दुखहरणनाथ : वासुकिनाथ से लगभग दो मील दक्षिण पहाड़ी पर यह मंदिर है। मंदिर में दुखहरणनाथ नामक शिवलिंग है। यहां चारों ओर पहाडिय़ां हैं।

नीमानाथ : वासुकिनाथ से पांच मील वायव्य कोण में मयूरक्षी नदी के तट पर नीमानाथ शिव मंदिर है। नीमा नामक प्राचीन शिवभक्त के यह आराध्य हैं।

शुंभेश्वरनाथ : देवघर-भागलपुर रोड पर सरैया हाट ग्राम से दो मील अग्नि कोण में यह विशाल मंदिर है। शुभ दैत्य ने यहां शंकर जी की आराधना की थी। यह स्थान घोर वन में है, यहां पार्वती मंदिर तथा दो और मंदिर हैं। शिवगंगा नाम की एक पुष्करिणी भी है।

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