Edited By Jyoti,Updated: 29 Oct, 2019 11:42 AM

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के आरंभ में पहले 8 अंगों तक जपुजी साहिब, 8 से 12 अंगों तक सोदर, सो पुरख (रहिरास साहिब) और 12 से 13 अंग तक सोहिला नाम की वाणी दर्ज की गई है। यह सिखों का नितनेम है।
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श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के आरंभ में पहले 8 अंगों तक जपुजी साहिब, 8 से 12 अंगों तक सोदर, सो पुरख (रहिरास साहिब) और 12 से 13 अंग तक सोहिला नाम की वाणी दर्ज की गई है। यह सिखों का नितनेम है। पहला राग कीर्तन सोहिले के बाद शुरू होता है और यह श्रीराग है। अंग 14 से लेकर अंग 1353 तक अलग-अलग रागों में वाणी की रचना है। इन रागों की संख्या 31 है। अंग 1353 से आगे राग मुक्त वाणी दर्ज की गई है। आखिर में श्री गुरु अर्जुन देव जी ने मुन्दावनी लिखकर वाणी की समाप्ति की मोहर लगा दी है जोकि अंग 1429 पर दर्ज है। सबसे आखिर में राग माला अंग 1429 से 1430 तक दर्ज की गई है।

समूची वाणी में सच्चे शुद्ध कर्म करते हुए अकाल पुरुष का नाम सदा ही सिमरन करते रहने की ताकीद की गई है। प्रभु का भजन जीवन का आधार बताया गया है। इसके अलावा वाणी में आध्यात्मिकवाद के साथ-साथ सांसारिक कद्रें-कीमतें और पौराणिक हवाले भी दिए गए। संपूर्ण श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में सत्य का ही प्रकाश है और एकमात्र अकाल पुरुख का नाम सिमरन करने और उसको याद रखने का आदेश है। इस नाम पर कैसे चलना है और नाम को मन में किस तरह से बसाना है, इस बारे श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में खुलकर बताया गया है। सत्य को सबसे अहम गुण बताते हुए सच्चे आचरण को सर्वोपरि बताया है।
