Jagannath Snan Yatra 2026 : पुरी में आज भगवान जगन्नाथ का महास्नान महोत्सव, स्नान के बाद 15 दिन तक भक्त नहीं कर पाएंगे दर्शन

Edited By Updated: 29 Jun, 2026 03:11 PM

jagannath snan yatra 2026

ओडिशा के प्रसिद्ध तीर्थस्थल पुरी में आज यानी  29 जून, 2026 के दिन ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के शुभ अवसर पर भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रसिद्ध स्नान यात्रा की जाती है।

Jagannath Snan Yatra 2026 : ओडिशा के प्रसिद्ध तीर्थस्थल पुरी में आज यानी  29 जून, 2026 के दिन ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के शुभ अवसर पर भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रसिद्ध स्नान यात्रा की जाती है। इस स्नान यात्रा में देश-विदेश से लोग भारी संख्या में मौजूद होते हैं और इस विशेष अनुष्ठानों के साक्षी बनते हैं। इस परंपरा के चलते इसे स्नान पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस साल रथ यात्रा 16 जुलाई 2026 को निकाली जाएगी। इस महापर्व से जुड़ी सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस शाही स्नान के तुरंत बाद भगवान बीमार पड़ जाएंगे और अगले 15 दिनों के लिए एकांतवास में चले जाएंगे। इस दौरान भक्तों को उनके दर्शन नहीं हो सकेंगे।

108 कलशों से किया जाएगा महाभिषेक
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा को महाप्रभु जगन्नाथ का प्राकट्य दिवस भी माना जाता है। इसी खुशी में आज सुबह भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र, देवी सुभद्रा और सुदर्शन जी को एक भव्य पहांडी के जरिए स्नान वेदी पर लाया गया। इसके बाद 108 कलशों के पवित्र जल से तीनों भाई-बहन का महाभिषेक किया गया। स्नान के बाद शाम को 4 या 5 बजे के बीच तीनों का गजानन वेश किया जाएगा और शाम 7 बजकर 30 मिनट से रात को 9 बजकर 30 मिनट तक इस रथ यात्रा में दूर-दूर से स्नान यात्रा में शामिल होने आए लोगों को दर्शन करने का मौका मिलेगा। इसके बाद रात 11 बजे से रात 2 बजे तक बाहुड़ा पहंडी की रस्म संपन्न होगी।

क्यों 15 दिनों के लिए बंद हो जाएंगे कपाट?
इस महास्नान के बाद भगवान जन्ननाथ 15 दिनों के बीमार हो जाते हैं और मंदिर के कपाट आम भक्तों के लिए बंद कर दिए जाते हैं। मान्यताओं के अनुसार, भीषण गर्मी के इस मौसम में 108 कलशों के ठंडे पानी से स्नान करने के कारण महाप्रभु जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी को तेज बुखार आ जाता है। बीमार होने के कारण भगवान जगन्नाथ को आराम करने के लिए एक विशेष कक्ष में रखा जाता है। यह एकांतवास पूरे 15 दिनों तक चलता है। इस दौरान भगवान को छप्पन भोग नहीं लगाया जाता। मंदिर के विशेष सेवक और वैद्य भगवान की सेवा करते हैं। उन्हें काढ़ा, जड़ी-बूटियां और फुलुरी तेल लगाया जाता है। इस अवधि में भगवान केवल फल और सादा भोजन ग्रहण करते हैं।

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