जलियांवाला बाग की वो खूनी बैसाखी: जब 1650 गोलियों ने थर्रा दिया था ब्रिटिश साम्राज्य, जानें रोंगटे खड़े कर देने वाला इतिहास

Edited By Updated: 14 Apr, 2026 12:22 PM

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Jallianwala Bagh History: 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में क्या हुआ था? जानें 1650 गोलियों का वो सच जिसने आजादी की लड़ाई को बदल दिया। जनरल डायर की हैवानियत और शहीदी कुएं की पूरी कहानी यहां पढ़ें।

Jallianwala Bagh History जलियांवाला बाग हत्याकांड का पूरा सच, जनरल डायर की क्रूरता और ऊधम सिंह का प्रतिशोध: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 13 अप्रैल 1919 का दिन एक ऐसा घाव है, जो आज भी हर हिंदुस्तानी के दिल में ताजा है। जब पूरा देश बैसाखी का पर्व मना रहा था, तब अमृतसर के जलियांवाला बाग में ब्रिटिश हुकूमत ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दी थीं। काला कानून और विरोध की गूंज प्रथम विश्व युद्ध के बाद जब देश आजादी के नारों से गूंज रहा था, तब अंग्रेजों ने इसे कुचलने के लिए रोलेट एक्ट (काला कानून) लागू किया। इस दमनकारी कानून के तहत किसी को भी बिना वारंट गिरफ्तार किया जा सकता था। पंजाब में तनाव तब और बढ़ गया जब अमृतसर के दो जनप्रिय नेताओं, डॉ. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर कालापानी की सजा सुना दी गई।

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10 मिनट, 1650 गोलियां और चीखता हुआ बाग
नेताओं की रिहाई और काले कानून के विरोध में 13 अप्रैल, 1919 को जलियांवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सभा बुलाई गई। सभा चल ही रही थी कि ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर अपने सैनिकों के साथ वहां जा पहुंचा। उसने बाग के एकमात्र संकरे रास्ते को बंद कर दिया और बिना किसी चेतावनी के निहत्थे लोगों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। मात्र 10 मिनट के भीतर लगभग 1650 गोलियां बरसाई गईं। सरकारी आंकड़ों में भले ही 379 मौतों की बात कही गई, लेकिन हकीकत में वहां हजारों निर्दोषों का खून बहा था।

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शहीदी कुआं और टैगोर का बलिदान
गोलीबारी से बचने के लिए लोग वहां स्थित एक कुएं में कूद गए, जिसे आज 'शहीदी कुआं' कहा जाता है। बाद में इस कुएं से लगभग 120 लाशें निकाली गईं।  इस अमानवीय कृत्य के विरोध में रबींद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई 'नाइटहुड' की उपाधि लौटा दी थी।

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लंदन तक पहुंचा प्रतिशोध
इस नरसंहार का बदला लेने की कसम एक नौजवान ने खाई थी—ऊधम सिंह। उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य केवल प्रतिशोध को बनाया और 13 मार्च, 1940 को लंदन में जाकर उस समय के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर को गोली मार दी, जिसने इस कत्लेआम की अनुमति दी थी।

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आज का स्मारक: शहीदों को नमन
1961 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने जलियांवाला बाग स्मारक का उद्घाटन किया था।  हाल ही में सरकार ने इसे नया रूप दिया है, जहां शहीदों की मूर्तियां और नई गैलरियां इस बलिदान की गाथा को जीवंत करती हैं।

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