Ramanujacharya Jayanti 2026: भक्ति मार्ग के शिखर पुरुष श्री रामानुजाचार्य की गाथा, जिन्होंने बदला अध्यात्म का स्वरूप, जानें उनके सिद्धांत और अद्भुत कथा

Edited By Updated: 22 Apr, 2026 10:04 AM

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Ramanujacharya Jayanti 2026: जानें श्री रामानुजाचार्य जी के जीवन की अद्भुत कथा, उनके द्वारा स्थापित श्री सम्प्रदाय के सिद्धांत और कैसे उन्होंने 120 वर्ष की आयु तक भक्ति मार्ग का प्रचार किया।

Ramanujacharya Jayanti 2026: भारतीय धर्म और दर्शन के इतिहास में श्री रामानुजाचार्य जी का नाम एक ऐसे तेजस्वी नक्षत्र के रूप में दर्ज है, जिन्होंने न केवल भक्ति मार्ग को नई दिशा दी, बल्कि समाज में समानता और प्रेम का संदेश भी फैलाया। वर्ष 2026 में उनकी जयंती के शुभ अवसर पर, आइए जानते हैं उनके जीवन के वे अनसुने पहलू और दिव्य सिद्धांत जिन्होंने करोड़ों लोगों के जीवन को नई ज्योति दी।

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बचपन में ही झेली चुनौतियां, शिकारी ने बचाई जान
श्रीरामानुजाचार्य के पिता का नाम केशव भट्ट था। वह दक्षिण तेंरुकुदूर क्षेत्र में रहते थे। जब श्रीरामानुजाचार्य की अवस्था बहुत छोटी थी, तभी इनके पिता का देहावसान हो गया। इन्होंने काञ्ची में यादव प्रकाश नामक गुरु से वेदाध्ययन किया। इनकी बुद्धि इतनी कुशाग्र थी कि ये अपने गुरु की व्याख्या में भी दोष निकाल दिया करते थे। फलत: इनके गुरु ने इन पर प्रसन्न होने के बदले ईर्ष्यालु होकर इनकी हत्या की योजना बना डाली, किन्तु भगवान की कृपा से एक शिकारी और उसकी पत्नी ने इनके प्राणों की रक्षा की।

गुरु की तीन मुड़ी हुई उंगलियां और वह महान संकल्प
श्रीरामानुजाचार्य बड़े ही विद्वान, सदाचारी, धैर्यवान और उदार थे। चरित्रबल और भक्ति में तो यह अद्वितीय थे। इन्हें योगसिद्धियां भी प्राप्त थीं। यह श्रीयामुनाचार्य की शिष्य-परम्परा में थे। जब श्रीयामुनाचार्य की मृत्यु सन्निकट थी, तब उन्होंने अपने शिष्य द्वारा श्रीरामानुजाचार्य को अपने पास बुलवाया, किन्तु इनके पहुंचने के पूर्व ही श्रीयामुनाचार्य की मृत्यु हो गई। वहां पहुंचने पर इन्होंने देखा कि श्रीयामुनाचार्य की तीन उंगलियां मुड़ी हुई थीं।

श्रीरामानुजाचार्य ने समझ लिया कि श्रीयामुनाचार्य इनके माध्यम से ‘ब्रह्मसूत्र’,  ‘विष्णु सहस्रनाम’ और अलवंदारों के ‘दिव्य प्रबंधम्’ की टीका करवाना चाहते हैं। इन्होंने श्रीयामुनाचार्य के मृत शरीर को प्रणाम किया और कहा ‘‘भगवान! मैं आपकी यह अंतिम इच्छा अवश्य पूरी करूंगा।’’

विशिष्ट सिद्धांत: 'श्री सम्प्रदाय' और भक्ति का मार्ग
श्री रामानुजाचार्य ने भक्ति मार्ग का प्रचार करने के लिए सम्पूर्ण भारत की यात्रा की। इन्होंने भक्ति मार्ग के समर्थन में गीता और ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखा। वेदांत सूत्रों पर इनका भाष्य ‘श्री भाष्य’ के नाम से प्रसिद्ध है। इनके द्वारा चलाए गए सम्प्रदाय का नाम भी ‘श्री सम्प्रदाय’ है। इस सम्प्रदाय की आद्यप्रवर्तिका श्री महालक्ष्मी जी मानी जाती हैं।

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उनके प्रमुख सिद्धांतों के अनुसार:
भगवान विष्णु ही पुरुषोत्तम हैं: वे ही प्रत्येक जीव में साक्षी रूप में विद्यमान हैं।

नारायण और लक्ष्मी का संबंध: भगवान नारायण 'सत्' हैं, उनकी शक्ति महालक्ष्मी 'चित्' हैं और यह सारा जगत उनके आनंद का विलास है।

समानता का संदेश: जगत के माता-पिता श्री लक्ष्मी-नारायण हैं और हम सभी उनकी संतान हैं, इसलिए कोई छोटा या बड़ा नहीं है।

120 वर्ष का यशस्वी जीवन और 74 शिष्य
श्रीरामानुजाचार्य गृहस्थ थे, किन्तु जब इन्होंने देखा कि गृहस्थी में रह कर अपने उद्देश्य  को पूरा करना कठिन है, तब इन्होंने गृहस्थ आश्रम को त्याग दिया और श्रीरंगम् जाकर यतिराज नामक संन्यासी से संन्यास धर्म की दीक्षा ले ली। इनके गुरु श्री यादव प्रकाश को अपनी पूर्व करनी पर बड़ा पश्चाताप हुआ और वह भी संन्यास की दीक्षा लेकर श्रीरंगम् आकर श्रीरामानुजाचार्य  की सेवा में रहने लगे। उन्होंने 120 वर्ष की आयु तक जीवित रहकर मानवता की सेवा की और महात्मा पिल्ललोकाचार्य को अपना उत्तराधिकारी बनाया। उनके 74 प्रमुख शिष्य थे जिन्होंने उनके सिद्धांतों को जन-जन तक पहुंचाया।

कबीर और सूरदास से नाता
बहुत कम लोग जानते हैं कि वैष्णव आचार्यों में प्रमुख रामानुजाचार्य की ही शिष्य परंपरा में आगे चलकर स्वामी रामानंद हुए। इसी परंपरा की गौरवशाली विरासत को संत कबीर और सूरदास जैसे महान कवियों ने आगे बढ़ाया।

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