Surdas Jayanti 2026: आज भी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में सुरक्षित है सूरसागर, जानें संत सूरदास के जीवन की अनसुनी बातें

Edited By Updated: 21 Apr, 2026 01:50 PM

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Surdas Jayanti Special: जानें, संत सूरदास के जीवन की अनसुनी बातें। कैसे एक नेत्रहीन कवि ने सम्राट अकबर की भेंट को ठुकरा दिया और क्यों 'सूरसागर' आज भी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में सुरक्षित है।

Surdas Jayanti 2026: सूरदास जी ने कृष्ण की बाल-लीलाओं और किशोरावस्था को जिस सजीवता से प्रस्तुत किया है, वह भारतीय संस्कृति को उच्च शिखर पर ले जाता है। उनका काव्य लालित्य, वात्सल्य और प्रेम की त्रिवेणी है, जो समाज को नई आस्था और अवधारणा प्रदान करता है।

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Sant Surdas Story: सूरदास जी का जन्म एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में संभवत: सन् 1535 की वैशाख शुक्ल पंचमी मंगलवार को हुआ। जन्म स्थान के सम्बन्ध में चार स्थान प्रसिद्ध हैं- गोपांचल, मथुरा का कोई एक गांव, रुनकता तथा सीही।

चार भाइयों में सूरदास सबसे छोटे एवं नेत्रहीन थे। माता-पिता इनकी ओर से उदासीन रहते थे। निर्धनता एवं माता-पिता की उनके प्रति उदासीनता ने उन्हें विरक्त बना दिया। वह घर से निकल कर चार कोस की दूरी पर तालाब के किनारे रहने लगे। 

वह संगीत-शास्त्र के परम ज्ञाता, काव्य नेपुण्य एवं गान-विद्या विशारद विषय में प्रतिभा सम्पन्न थे। इनके गोलोकवासी होने के समय के सम्बन्ध में भी विद्वान एक मत नहीं हैं। अधिकांश विद्वान इनका निधन सं. 1640 का समय मानते हैं। इस दृष्टि से उनको 105 वर्ष की दीर्घायु मिली।

कुछ लोगों के अनुसार सम्राट अकबर सूरदास से मिलने आए थे। कहते हैं कि तानसेन ने अकबर के समक्ष सूरदास का एक पद गाया। पद के भाव से मुग्ध होकर सम्राट अकबर मथुरा जाकर सूरदास से मिले। सूरदास ने बादशाह को मना रे माधव सौं करु प्रीती गाकर सुनाया। 

बादशाह ने प्रसन्न होकर सूरदास को अपना यश वर्णन करने का आग्रह किया। तब निर्लिप्त सूरदास ने नाहिन रहनो मन में ठौर पद गाया। 

पद के अंतिम चरण सूर ऐसे दरस को ए मरत लोचन व्यास को लेकर बादशाह ने पूछा ‘‘सूरदास जी आप नेत्र ज्योति से वंचित हैं, फिर आपके नेत्र दरस को कैसे प्यासे मरते हैं?’’ 

सूरदास जी ने कहा, ‘‘ये नेत्र भगवान को देखते हैं और उस स्वरूप का रसपान प्रतिक्षण करने पर भी अतृप्त बने रहते हैं।’’

अकबर ने सूरदास से द्रव्य-भेंट स्वीकार करने का अनुरोध किया पर निडरतापूर्वक भेंट अस्वीकार करते हुए सूरदास जी ने कहा आज पीछे हमको कबहूं फेरि मत बुलाइयो और मोको कबहूं लिलियो मती। 

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साहित्य का 'महासागर': सूरसागर
सूरदास जी का काव्य श्रीमद्भागवत से सर्वाधिक प्रभावित रहा है। उन्होंने आजीवन श्री गोवद्र्धन नाथ जी के चरणों में बैठकर ब्रजभाषा काव्य के रूप में भागीरथी का संचार किया। सूरदास जी कृष्ण भक्ति धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। नागरी प्रचारिणी सभा की खोज के अनुसार सूरदास जी के नाम से 25 रचनाएं उपलब्ध हैं परन्तु अधिकांश विद्वान उनकी केवल तीन रचनाओं सूरसागर, सूर-सारवली और साहित्य लहरी को ही प्रामाणिक मानते हैं। 

सूरदास जी ने काव्य लिखा नहीं, बल्कि उनके मुख से श्रीकृष्ण की लीलाओं के पद स्वतः ही प्रस्फुटित हुए। उनके पदों के संग्रह को 'सूरसागर' के नाम से जाना जाता है, जो काव्य रस का एक महासागर है। इसकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय और ब्रिटिश म्यूजियम जैसे पुस्तकालयों में भी 'सूरसागर' की हस्तलिखित प्रतियाँ सुरक्षित हैं।

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राष्ट्रीय जीवन में सूरदास
संत सूरदास द्वारा रचित काव्य साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान भारतीय लोक संस्कृति और परम्परा को उच्च शिखर पर आसीन कराने में हुआ। उन्होंने द्वापर के नायक श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का समसामयिक लोक-आस्था के अनुरूप चित्रण किया और भगवान को एक लोकनायक के रूप में प्रस्तुत किया। 

भगवान को लौकिक रूप में प्रस्तुत कर सूरदास जी ने हमारे समाज को एक नई आस्था एवं अवधारणा दी है। वास्तव में सूरदास जी का काव्य लालित्य, वात्सल्य और प्रेम का काव्य है।

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