Edited By Sarita Thapa,Updated: 24 Apr, 2026 12:37 PM

हिंदू धर्म में सीता नवमी का बहुत खास महत्व है। हर साल वैसाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन सीता नवमी मनाई जाती है। यह दिन सीता नवमी या जानकी नवमी के रूप में मनाया जाता है, जो माता सीता के जन्म का महोत्सव है।
Sita Navami vrat katha : हिंदू धर्म में सीता नवमी का बहुत खास महत्व है। हर साल वैसाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन सीता नवमी मनाई जाती है। यह दिन सीता नवमी या जानकी नवमी के रूप में मनाया जाता है, जो माता सीता के जन्म का महोत्सव है। माना जाता है कि इस दिन माता सीता की पूरे विधि-विधान से पूजा करने और व्रत रखने से सारे दुख दूर होते हैं और सुहागिनों को सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। इस दिन सीता माता की पूजा करने और वर्त रखने के साथ ही उनकी कथा सुनने और पढ़ने का भी बहुत खास महत्व है। तो आइए जानते हैं माता सीता की कथा के बारे में-
सीता नवमी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार मारवाड़ में एक देवदत्त नाम का ब्राह्मण रहता था, जो भगवान की पूजा भक्ति में लीन रहता था। देवदत्त की पत्नी जिसका नाम शोभना था, उसकी सुंदरता की तारीफ पूरे क्षेत्र में की जाती थी। यही बात का घमंड उसकी पत्नी के अंदर था। उसके अनुसार वह पूरे संसार में सबसे ज्यादा खूबसूरत और सौंदर्य वान है। इसी घमंडी व्यवहार के कारण वो अन्य लोगों को आप अपने सामने कुछ समझती ही नहीं थी और अक्सर सभी के साथ बुरा व्यवहार किया करती थी।
एक बार उनके गांव में बेहद सुंदर कन्याएं आई जो देवदत्त की पत्नी शोभना से भी ज्यादा सुंदर थी। लेकिन यह बात जब ब्राह्मण की पत्नी को पता चली तो वह ईर्ष्या करने लगी। अपने क्रोध के कारण उसने पूरे गांव को कुछ लोगों से कहकर जलवा दिया। थोड़े समय बाद ब्राह्मणी की भी मृत्यु हो गई। लेकिन पिछले कर्मों के रूप में उसे अगला जन्म चांडाली का मिला और उसके जीवन में बहुत कष्ट आए, जिससे उसे भुगतना था।

उसे हमेशा तिरस्कार का सामना करना पड़ता लेकिन इस बार वह मां सीता की सच्ची भक्त थी। एक दिन लोगों के तिरस्कार के कारण बहुत दुखी हो गई और मां सीता की प्रतिमा के सामने अपने दुखों को रोकर बताने लगी। ऐसे में मां सीता ने चांडाली को पूर्व जन्म की याद दिलाई कि पिछले जन्म में चांडा ने ईर्षा के कारण पूरे गांव को आग लगवा दी थी।
यह पता चलाने के बाद चांडाली को बहुत दुख हुआ और उसने अपने पापों का पश्चाताप करने का सोचा। उसने अपने बुरे कर्मों को नष्ट करने के लिए वैशाख माह की नवमी के दिन उपासना और वृत रखना शुरू किया। सच्चे मन से की गई भक्ति से मां सीता प्रसन्न हो गई और आशीर्वाद स्वरूप धीरे-धीरे चांडाली के सभी पापों का नाश होने लगा। चांडाली को पिछले जन्म के पापों से मुक्ति मिली। तभी से मां सीता की पूजा शुरू हुई, जिसे हम सीता नवमी के रूप में जानते हैं।

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